Nifty 50 Shareholding: रिकॉर्ड निचले स्तर पर फिसले विदेशी निवेशक, ₹1 लाख करोड़ से ज़्यादा की बिकवाली

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Nifty 50 Shareholding: रिकॉर्ड निचले स्तर पर फिसले विदेशी निवेशक, ₹1 लाख करोड़ से ज़्यादा की बिकवाली

भारतीय बाज़ार में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। बड़े यानी लार्ज-कैप शेयरों में संस्थागत निवेशकों (Institutional Investors) की हिस्सेदारी रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई है। Nifty 50 में इनकी हिस्सेदारी घटकर **56.1%** रह गई है, जो Q1 FY27 के आंकड़े हैं। निवेशक अब मिड और स्मॉल-कैप शेयरों में मौके तलाश रहे हैं।

पूंजी का बड़ा फेरबदल

NSE मार्केट पल्स की अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक, Nifty 50 इंडेक्स में संस्थागत निवेशकों का निवेश काफी कम हो गया है। यह पिछले तिमाही के मुकाबले 3.1% कम है। दिसंबर 2019 में, जब बाज़ार का माहौल अलग था, तब यह हिस्सेदारी 72.4% के शिखर पर थी।

यह गिरावट सिर्फ विदेशी निवेशकों (FPIs) तक ही सीमित नहीं है। घरेलू म्यूचुअल फंड्स (Mutual Funds) ने भी लार्ज-कैप कंपनियों में अपना पैसा 4.3% घटाकर 83.5% कर दिया है। वहीं, FPIs ने इन बड़ी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 89% कर दी है, जो पिछले छह सालों का सबसे निचला स्तर है।

आम निवेशकों ने भी Nifty 50 में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 33.4% कर ली है, जो कि एक रिकॉर्ड है। साफ है कि बाज़ार में पैसा लगाने वाले अब बड़ी कंपनियों के अलावा मिड-कैप, स्मॉल-कैप और माइक्रो-कैप कंपनियों में ग्रोथ के मौके देख रहे हैं। NSE पर लिस्टेड कंपनियों में FPIs की हिस्सेदारी वाले शेयरों की संख्या 2020 के अंत में लगभग 1,200 से बढ़कर अब 2,000 से ज़्यादा हो गई है। इससे पता चलता है कि संस्थागत पैसा अब ज़्यादा कंपनियों में फैल रहा है।

लार्ज-कैप पर दबाव क्यों?

Nifty 50 इंडेक्स में हाल के दिनों में दबाव देखा गया है, और यह 19 अगस्त 2026 तक लगातार सात सत्रों में गिरा है। इस दबाव का एक बड़ा कारण FPIs की लगातार बिकवाली है। 2026 में अब तक FPIs भारतीय इक्विटी बाज़ार में ₹1 लाख करोड़ से ज़्यादा की नेट बिकवाली कर चुके हैं।

हालांकि यह पैसा ज़्यादा रिटर्न की तलाश में दूसरी जगहों पर जा रहा है, लेकिन इसमें कुछ खतरे भी हैं। मिड और स्मॉल-कैप शेयर, लार्ज-कैप शेयरों की तुलना में ज़्यादा वोलेटाइल (volatile) होते हैं और आर्थिक बदलावों के प्रति ज़्यादा संवेदनशील होते हैं। इन छोटी कंपनियों का प्रदर्शन घरेलू मांग से ज़्यादा जुड़ा होता है, जिससे वे कच्चे तेल की कीमतों में अचानक उछाल या मध्य-पूर्व में चल रहे संघर्ष जैसी भू-राजनीतिक तनावों के प्रति ज़्यादा असुरक्षित हो जाती हैं। इसके अलावा, अमेरिका में बॉन्ड यील्ड (bond yields) बढ़ने से उभरते बाज़ारों से ग्लोबल पैसा खिंच सकता है, जो छोटी और कम लिक्विड (liquid) कंपनियों में निवेश करने वाले निवेशकों के लिए एक और जोखिम पैदा करता है।

निवेशकों के लिए खास बातें

निवेशकों को यह देखना होगा कि यह पोर्टफोलियो री-एलोकेशन (re-allocation) बाज़ार में तनाव के समय में उनके निवेश पर कैसा असर डालता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि क्या मिड और स्मॉल-कैप कंपनियां अपनी कमाई में वह ग्रोथ दिखा पाती हैं जो संस्थागत ध्यान को सही ठहरा सके। साथ ही, बाज़ार पर नज़र रखने वाले यह भी देखेंगे कि क्या FPIs लार्ज-कैप में बिकवाली जारी रखते हैं या घरेलू संस्थागत निवेशक इंडेक्स को सहारा दे पाते हैं। बढ़ती रॉ-मटेरियल (raw material) लागत के बीच इन छोटी कंपनियों की प्रॉफिट मार्जिन (profit margin) बनाए रखने की क्षमता भी आने वाली तिमाही नतीजों में देखने लायक होगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.