Inflation Control: Repo Rate नहीं, 'Money Supply' है महंगाई का असली मीटर!

ECONOMY
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AuthorNeha Patil|Published at:
Inflation Control: Repo Rate नहीं, 'Money Supply' है महंगाई का असली मीटर!

C. Rangarajan और K.R. Shanmugam की एक नई स्टडी ने बाजार के जानकारों को चौंका दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, महंगाई का सही अनुमान लगाने के लिए रेपो रेट से ज्यादा भरोसेमंद पैमाना 'Money Supply' (M3) है। निवेशकों के लिए इसका मतलब यह है कि अब लिक्विडिटी पर नजर रखना बहुत जरूरी हो गया है।

ज्यादातर निवेशक महंगाई की दिशा भांपने के लिए Reserve Bank of India (RBI) के रेपो रेट पर नजर रखते हैं। लेकिन, अर्थशास्त्री C. Rangarajan और K.R. Shanmugam की हालिया रिसर्च एक अलग ही तस्वीर पेश करती है। स्टडी बताती है कि अर्थव्यवस्था में दौड़ रहे पैसे की मात्रा यानी 'Money Supply' महंगाई का सटीक संकेत देती है, न कि सिर्फ ब्याज दरें।

क्यों है यह बदलाव जरूरी?

पारंपरिक तौर पर, सेंट्रल बैंक ब्याज दरें बढ़ाकर मांग कम करने की कोशिश करते हैं। लेकिन 1994 से 2024 तक के डेटा का विश्लेषण करने के बाद यह स्पष्ट है कि जब बाजार में पैसे की सप्लाई (खासकर M3) बढ़ती है और उस अनुपात में सामान या सेवाओं का उत्पादन नहीं बढ़ता, तो कीमतें बढ़नी तय हैं—फिर चाहे रेपो रेट कुछ भी हो।

निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?

अगर सेंट्रल बैंक अब महंगाई रोकने के लिए लिक्विडिटी मैनेजमेंट को अपना मुख्य हथियार बनाता है, तो भविष्य में Open Market Operations (OMO) जैसे टूल्स का इस्तेमाल बढ़ सकता है। निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि:

  • मुनाफे पर असर: ज्यादा महंगाई कंपनियों की रॉ-मटेरियल कॉस्ट बढ़ाती है, जिससे उनके नेट प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आता है।
  • पॉलिसी का नया रंग: भविष्य में केवल रेपो रेट को देखकर निवेश का फैसला लेना अधूरा हो सकता है। आपको सिस्टम की डेली लिक्विडिटी सरप्लस या डेफिसिट पर भी नजर रखनी होगी।

निष्कर्ष यह है कि महंगाई पर लगाम लगाने के लिए लिक्विडिटी के एक्शन और ब्याज दर के उद्देश्यों में बेहतर तालमेल की जरूरत है। अब निवेशकों को अपनी स्ट्रैटेजी में लिक्विडिटी के इस नए 'मीटर' को भी शामिल करना चाहिए।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.