देशभर के हाईवे पर टोल दरों में अगले फाइनेंशियल ईयर में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) से जुड़ी इस संभावित वृद्धि से इंफ्रा कंपनियों के रेवेन्यू को सहारा मिलेगा, लेकिन लॉजिस्टिक्स सेक्टर पर दबाव बढ़ सकता है।
देशभर में नेशनल हाईवे पर टोल रेट्स में सालाना एडजस्टमेंट की प्रक्रिया अगले फाइनेंशियल ईयर में फिर से देखने को मिल सकती है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) के आधार पर टोल दरों में बढ़ोतरी की जा सकती है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह कोई नेशनल हाइक नहीं है, बल्कि कॉन्ट्रैक्ट एग्रीमेंट के मुताबिक होने वाला सामान्य बदलाव है, जो सरकारी नोटिफिकेशन पर निर्भर करेगा।
इंफ्रा और लॉजिस्टिक्स पर क्या होगा असर?
टोल दरों में बढ़ोतरी का असर अलग-अलग सेक्टरों पर अलग तरह से पड़ता है। रोड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपर्स और BOT (बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर) प्रोजेक्ट्स चलाने वाली कंपनियों के लिए यह एक तरह का 'इंफ्लेशन प्रोटेक्शन' है। अगर ट्रैफिक वॉल्यूम कम भी रहता है, तो भी टोल रेट्स बढ़कर कंपनी के मार्जिन को सुरक्षित रखते हैं।
दूसरी तरफ, लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन सेक्टर के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। ट्रकिंग कंपनियों के लिए टोल का खर्च एक बड़ा ऑपरेशनल एक्सपेंस होता है। अगर टोल बढ़ता है, तो कंपनियों को या तो मार्जिन में कटौती करनी होगी या फिर फ्रेट रेट्स (भाड़ा) बढ़ाकर इसका बोझ ग्राहकों पर डालना होगा।
रेवेन्यू और ट्रैफिक ट्रेंड्स पर नजर
इन्वेस्टर्स फिलहाल टोल कलेक्शन और वाहनों की संख्या (Traffic Volume) के बीच के गणित को ट्रैक कर रहे हैं। हालिया ट्रेंड्स बताते हैं कि कंपनियों का रेवेन्यू तो बढ़ रहा है, लेकिन ट्रैफिक वॉल्यूम की रफ्तार कुछ इलाकों में सुस्त हुई है। इसका मतलब है कि कमाई का जरिया 'ट्रैफिक' से ज्यादा 'प्राइसिंग पावर' बनता जा रहा है।
आने वाले समय में निवेशकों के लिए NHAI के आधिकारिक नोटिफिकेशंस पर नजर रखना सबसे जरूरी होगा। ग्लोबल कमोडिटी और एनर्जी प्राइसेस में होने वाला बदलाव WPI को प्रभावित करता है, जिसका सीधा कनेक्शन टोल दरों के फॉर्मूले से होता है।
