Semicon 2.0: भारत का ₹1.27 लाख करोड़ का मास्टरप्लान, अब चिप डिज़ाइन और टैलेंट पर फोकस!

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Semicon 2.0: भारत का ₹1.27 लाख करोड़ का मास्टरप्लान, अब चिप डिज़ाइन और टैलेंट पर फोकस!

भारत सरकार ने सेमीकंडक्टर मिशन के दूसरे चरण, 'सेमिकॉन 2.0' को **₹1.275 लाख करोड़** के भारी बजट के साथ हरी झंडी दे दी है। यह नई नीति सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग पर ही नहीं, बल्कि **315 से ज़्यादा यूनिवर्सिटीज़** के ज़रिए ख़ास स्किल्ड वर्कफ़ोर्स तैयार करने पर भी ज़ोर दे रही है। हालांकि, ये लंबी अवधि की ग्रोथ के लिए बड़ा कदम है, पर इसमें भारी कैपिटल इंटेंसिटी और ज़ीरो से एक ग्लोबल इंडस्ट्री बनाने के ऑपरेशनल रिस्क का ध्यान रखना होगा।

भारत में सेमीकंडक्टर का नया दौर: सेमिकॉन 2.0

भारतीय सरकार ने सेमीकंडक्टर मिशन के दूसरे चरण, जिसे 'सेमिकॉन 2.0' नाम दिया गया है, की शुरुआत कर दी है। इस मिशन के लिए ₹1.275 लाख करोड़ का बड़ा बजट तय किया गया है। जहाँ पहले चरण में मैन्युफैक्चरिंग की नींव रखने पर ध्यान था, वहीं अब इस नए चरण का मकसद एक मज़बूत इकोसिस्टम तैयार करना है, खासकर टैलेंट की कमी को पूरा करके। सरकार समझती है कि इंफ्रास्ट्रक्चर तो पैसे से बनाया जा सकता है, लेकिन इंडस्ट्री की असली तरक्की तो ऐसे वर्कफ़ोर्स पर टिकी है जो इनोवेशन ला सके।

यूनिवर्सिटीज़ बनेंगी चिप इकोसिस्टम का हिस्सा

वैश्विक मानकों को पूरा करने के लिए, सरकार अब हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस को सीधे मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू चेन में शामिल कर रही है। देश भर की 315 से ज़्यादा यूनिवर्सिटीज़ को एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक डिज़ाइन ऑटोमेशन (EDA) टूल्स का एक्सेस दिया गया है। ये वो ज़रूरी सॉफ्टवेयर हैं जो कॉम्प्लेक्स माइक्रोचिप्स को डिज़ाइन करने के लिए चाहिए। इस पहल में Synopsys, Cadence, Siemens, Renesas, Ansys, और AMD जैसी ग्लोबल कंपनियों के साथ कोलैबोरेशन भी शामिल है। इसका मक़सद सिर्फ किताबी ज्ञान से आगे बढ़कर स्टूडेंट्स को चिप डिज़ाइन और ऑटोमेशन में प्रैक्टिकल अनुभव देना है, ताकि वे इंडस्ट्री में कदम रखते ही तैयार हों।

सेमिकॉन 2.0 के छह अहम स्तंभ

इस पॉलिसी को छह मुख्य स्तंभों पर खड़ा किया गया है: चिप डिज़ाइन, मशीनें और मैटेरियल्स, फैब्रिकेशन (फैब्स), एडवांस्ड पैकेजिंग, रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D), और टैलेंट क्रिएशन। इन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करके, सरकार का लक्ष्य भारत को सेमीकंडक्टर के एक बड़े उपभोक्ता से वैश्विक वैल्यू चेन के एक अहम खिलाड़ी के रूप में बदलना है। कंपनी का लॉन्ग-टर्म लक्ष्य 2035 तक 3nm और 2nm जैसे एडवांस्ड टेक्नोलॉजी नोड्स हासिल करना है। इसके अलावा, नए को-इन्वेस्टमेंट मॉडल भी लाए जा रहे हैं, जहाँ सरकार प्राइवेट वेंचर कैपिटलिस्ट्स के साथ मिलकर हाई-एंड चिप डिज़ाइन प्रोजेक्ट्स में पैसा लगाएगी, जिनके लिए अक्सर ₹1,000 करोड़ से ज़्यादा का इंडिविजुअल इन्वेस्टमेंट चाहिए होता है।

निवेशकों के लिए रणनीतिक जोखिम और देखने लायक बातें

निवेशकों के नज़रिए से, यह पॉलिसी शिफ्ट एक लॉन्ग-टर्म स्ट्रक्चरल बदलाव का संकेत है, लेकिन इसमें चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। सेमीकंडक्टर सेक्टर में बहुत ज़्यादा कैपिटल की ज़रूरत होती है और प्रॉफिटेबिलिटी आने से पहले कई सालों तक लगातार फंडिग की ज़रूरत पड़ती है। मुख्य जोखिमों में पॉलिसी बनाने से लेकर बड़े पैमाने पर, लागत-प्रभावी मैन्युफैक्चरिंग तक पहुँचने की मुश्किल शामिल है। भारत को स्थापित खिलाड़ियों से कड़ी वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना भी करना पड़ेगा, खासकर उन देशों से जो दशकों से इस सेक्टर पर हावी हैं।

इसके अलावा, इम्पोर्टेड टेक्नोलॉजीज़ और ज़रूरी कच्चे माल पर रणनीतिक निर्भरता को मैनेज करना होगा ताकि टेक्नोलॉजी सॉवरेन्टी सुनिश्चित की जा सके। इस पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार और प्राइवेट सेक्टर इन जटिल प्रोजेक्ट्स को कितनी प्रभावी ढंग से लागू कर पाते हैं, लागत को कंट्रोल में रखते हैं, और इंडस्ट्री-अकैडेमिया के बीच लगातार सहयोग बनाए रखते हैं। बाज़ार के लिए अगली अहम अपडेट्स इन फैब्रिकेशन यूनिट्स के कमीशनिंग टाइमलाइन और इन ख़ास यूनिवर्सिटी प्रोग्राम्स से एक्टिव वर्कफोर्स में आने वाले स्टूडेंट्स की संख्या के बारे में होंगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.