इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) ने भारत के **$5 ट्रिलियन** इकोनॉमी बनने का लक्ष्य अब **2029** तक खिसका दिया है। इसकी मुख्य वजह रुपये में आने वाली गिरावट है, न कि देश की विकास दर में कमी।
रुपये की चाल और GDP का गणित
IMF के इस नए अनुमान के पीछे की सबसे बड़ी वजह डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरती वैल्यू है। IMF का अनुमान है कि 2028 तक रुपया औसतन 95.5 के स्तर तक जा सकता है, जो पहले 93.3 आंका गया था। चूंकि दुनिया में GDP की रैंकिंग डॉलर में मापी जाती है, इसलिए रुपये के कमजोर होने से भारत की इकोनॉमी का डॉलर-वैल्यूएशन प्रभावित होता है, भले ही देश के भीतर प्रोडक्शन और ग्रोथ तेज बनी रहे।
असली विकास दर अभी भी मजबूत
निवेशकों को यह समझना जरूरी है कि यह सिर्फ एक करेंसी-लिंक्ड कैलकुलेशन है। अच्छी खबर यह है कि IMF ने 2027 फाइनेंशियल ईयर के लिए भारत की रियल GDP ग्रोथ का अनुमान 6.4% से बढ़ाकर 7% कर दिया है। इसका मतलब है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी पिलर्स—जैसे कंजम्पशन और सर्विस सेक्टर—पूरी तरह मजबूत हैं।
दुनिया की चौथी बड़ी इकोनॉमी बनने की राह
लक्ष्य में देरी के बावजूद भारत की ग्लोबल दौड़ जारी है। उम्मीद है कि 2027 तक भारत $4.52 ट्रिलियन की GDP के साथ जापान और यूके को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी इकोनॉमी बन जाएगा। वहीं, 2031 तक भारत के तीसरे नंबर की इकोनॉमी बनने की भी पूरी संभावना है।
निवेशकों के लिए क्या है मतलब?
करेंसी में उतार-चढ़ाव का सीधा असर उन कंपनियों पर पड़ता है जो इम्पोर्ट ज्यादा करती हैं (जैसे ऑयल रिफाइनर्स या इलेक्ट्रॉनिक्स), क्योंकि उन्हें पेमेंट डॉलर में करना पड़ता है। हालांकि, आईटी (IT) और टेक्सटाइल जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर को रुपये की कमजोरी से फायदा मिल सकता है। अब सभी की नजरें रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) पर हैं कि वे विदेशी मुद्रा की इस अस्थिरता को कैसे मैनेज करते हैं।
