India's $30 Trillion GDP Goal Needs Labour Reforms: NCAER Study

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AuthorMehul Desai|Published at:
India's $30 Trillion GDP Goal Needs Labour Reforms: NCAER Study

NCAER की एक नई स्टडी के मुताबिक, भारत अगर लेबर रिफॉर्म्स (Labour Reforms) पर ध्यान नहीं देता है, तो 2047 तक $30 ट्रिलियन GDP के लक्ष्य से $8 ट्रिलियन पीछे रह सकता है। इस स्टडी में कहा गया है कि कम प्रोडक्टिविटी वाले एग्रीकल्चर (Agriculture) से वर्कर्स को मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) और सर्विस सेक्टर (Services) में ले जाना बेहद जरूरी है। यह निवेशकों के लिए इस बात का संकेत है कि रेगुलेटरी एफिशिएंसी (Regulatory Efficiency) और प्रोडक्टिविटी ग्रोथ (Productivity Growth) लॉन्ग-टर्म कॉर्पोरेट परफॉर्मेंस के लिए कितनी अहम हैं।

$30 ट्रिलियन GDP का लक्ष्य और लेबर रिफॉर्म्स का महत्व

NCAER (National Council of Applied Economic Research) इंडिया पॉलिसी फोरम में पेश की गई एक नई स्टडी ने भारत के 2047 तक $30 ट्रिलियन की इकोनॉमी बनने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने में लेबर रिफॉर्म्स (Labour Reforms) की अहमियत पर रोशनी डाली है। स्टडी में यह भी चेतावनी दी गई है कि अगर लेबर मार्केट में बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव नहीं किए गए, तो देश की GDP $30 ट्रिलियन के लक्ष्य से $8 ट्रिलियन पीछे रह सकती है, यानी यह केवल $21.91 ट्रिलियन तक ही पहुँच पाएगी। यह चर्चा 6 से 8 अगस्त, 2026 तक नई दिल्ली में हुई, जिसमें उन बाधाओं को दूर करने की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया गया जो देश की आर्थिक क्षमता को रोक रही हैं।

समस्या की जड़: वर्कफोर्स का वितरण

समस्या की मुख्य वजह वर्कफोर्स (Workforce) का वितरण है। भारत का एक बड़ा हिस्सा अभी भी एग्रीकल्चर (Agriculture) सेक्टर में काम कर रहा है, जहां प्रति कर्मचारी उत्पादकता (Productivity) आम तौर पर कम होती है। स्टडी का तर्क है कि सस्टेनेबल ग्रोथ (Sustainable Growth) के लिए, इस लेबर को मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) और सर्विसेज (Services) जैसे हाई-प्रोडक्टिविटी वाले सेक्टर्स में ले जाना होगा। इस ट्रांजिशन (Transition) को बेहतर बनाना देश के ओवरऑल आउटपुट (Output) और वेल्थ (Wealth) को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है।

प्रोडक्टिविटी पर फोकस क्यों?

रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि भविष्य का ग्रोथ केवल कैपिटल एक्युमुलेशन (Capital Accumulation) पर निर्भर नहीं रह सकता, जो पिछले कुछ दशकों में भारत के डेवलपमेंट का मुख्य जरिया रहा है। इसके बजाय, ध्यान टोटल फैक्टर प्रोडक्टिविटी (Total Factor Productivity - TFP) पर शिफ्ट होना चाहिए। TFP यह मापता है कि कोई इकोनॉमी अपने लेबर और कैपिटल रिसोर्सेज (Capital Resources) का कितनी कुशलता से उपयोग करती है। जब TFP कम या स्थिर होता है, तो यह ओवरऑल इकोनॉमिक परफॉर्मेंस पर एक दबाव बनाता है। शोधकर्ताओं ने बताया कि भारत की TFP ग्रोथ धीमी रही है, और 2016 के बाद तो यह नेगेटिव (Negative) भी हो गई थी। ऐसे में, इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) या एक्सपैंशन (Expansion) पर सिर्फ ज्यादा खर्च करने की बजाय एफिशिएंसी (Efficiency) पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी हो जाता है।

बिजनेस और रेगुलेशन पर असर

भारतीय सरकार ने 29 मौजूदा लेबर कानूनों को चार नए कोड्स में समेकित करके इन स्ट्रक्चरल इश्यूज (Structural Issues) को एड्रेस करने की कोशिश की है। इनमें वेज कोड (Code on Wages), इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड (Industrial Relations Code), सोशल सिक्योरिटी कोड (Code on Social Security), और ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड (Occupational Safety, Health and Working Conditions Code) शामिल हैं। कॉर्पोरेट इंडिया (Corporate India) के लिए ये रिफॉर्म्स काफी अहम हैं। कॉम्प्लेक्स रेगुलेशंस (Complex Regulations) को सरल बनाना आमतौर पर कंप्लायंस कॉस्ट (Compliance Costs) को कम करने, वर्कर बेनिफिट्स (Worker Benefits) को स्टैंडर्डाइज (Standardize) करने और विभिन्न राज्यों में बिजनेस करने की आसानी (Ease of Doing Business) को बेहतर बनाने वाला कदम माना जाता है। निवेशक अक्सर इस तरह के रेगुलेटरी हार्मोनाइजेशन (Regulatory Harmonization) को इंडस्ट्रियल ऑपरेशनल एफिशिएंसी (Industrial Operational Efficiency) के लिए एक पॉजिटिव सिग्नल के तौर पर देखते हैं।

निवेशकों के लिए क्या है खास?

$30 ट्रिलियन की इकोनॉमी का मैक्रो गोल (Macro Goal) तो ठीक है, लेकिन निवेशकों के लिए सबसे अहम बात इन स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स की स्पीड (Speed) और इफेक्टिवनेस (Effectiveness) है। अगर इन बदलावों को ठीक से लागू नहीं किया गया, तो लॉन्ग-टर्म GDP ग्रोथ धीमी होने का खतरा है। इससे देश मिडिल- इनकम ट्रैप (Middle-Income Trap) में फंस सकता है, जहां प्रोडक्टिविटी में बढ़ोतरी, वेज (Wage) या कॉस्ट (Cost) की उम्मीदों के साथ तालमेल नहीं बिठा पाएगी। मार्केट पार्टिसिपेंट्स (Market Participants) के लिए मुख्य बात यह देखना होगी कि इन लेबर कोड्स को विभिन्न राज्यों में कैसे लागू किया जा रहा है, और क्या कोई ऐसे ऑफिशियल डेटा या कॉर्पोरेट रिजल्ट्स (Corporate Results) आते हैं जो ऑपरेशनल एफिशिएंसी या लेबर प्रोडक्टिविटी में सुधार का संकेत देते हैं। इन ट्रेंड्स पर नजर रखने से यह समझने में मदद मिलेगी कि इकोनॉमी सफलतापूर्वक एक अधिक कुशल, हाई-वैल्यू प्रोडक्शन मॉडल (High-Value Production Model) की ओर बढ़ रही है या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.