नया डेटा सामने आया है कि भारत में **67%** महिलाएं पैदल या पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर निर्भर हैं, जो उनके करियर की राह में बड़ी बाधा है। अब सरकारें सिर्फ फ्री सफर नहीं, बल्कि सुरक्षा और नई बसों के लिए फंड बढ़ाने की तैयारी में हैं।
भारत में महिलाओं के लिए मोबिलिटी का अंतर अब आर्थिक नीतियों के केंद्र में आ गया है। नेशनल हाउसहोल्ड ट्रैवल सर्वे (National Household Travel Survey) के आंकड़े बताते हैं कि पुरुषों के पास निजी वाहन होने के बावजूद, करीब 67% महिला यात्री पैदल चलने या पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर आश्रित हैं। शहरों में 21% से ज्यादा महिलाएं काम पर जाने के लिए बसों का इस्तेमाल करती हैं, जबकि पुरुषों का आंकड़ा 7% से भी कम है।
पब्लिक ट्रांसपोर्ट का आर्थिक पहलू
देश के 8 राज्यों और 1 केंद्र शासित प्रदेश ने महिलाओं के लिए बस सफर फ्री कर दिया है। यह कदम एक आर्थिक उत्प्रेरक (economic catalyst) के रूप में काम कर रहा है, जिससे महिलाओं की वर्कफोर्स में भागीदारी बढ़ रही है। हालांकि, सिर्फ किराया माफ करना काफी नहीं है। UN Women की रिपोर्ट और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भीड़भाड़, कम रोशनी और सुरक्षा संबंधी चिंताएं आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े बदलाव की उम्मीद
आने वाले समय में सरकारी फंड्स का बड़ा हिस्सा अब पब्लिक ट्रांजिट एसेट्स पर खर्च होने की उम्मीद है। इसमें नई बसों के बेड़े (bus fleets) की खरीद, रियल-टाइम ट्रैकिंग तकनीक और ट्रांजिट स्टॉप्स को बेहतर बनाना शामिल है। निवेशकों के लिए यह खबर अहम है क्योंकि ये बदलाव सीधे तौर पर ट्रांसपोर्ट मैन्युफैक्चरिंग और पब्लिक सेफ्टी टेक कंपनियों के ऑर्डर बुक्स को प्रभावित करते हैं।
अब सबकी नजरें सरकार द्वारा शहरी ट्रांजिट विस्तार के लिए जारी होने वाले नए बजट और सेफ्टी-फोकस्ड इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर टिकी हैं।
