भारत की अर्थव्यवस्था एक बड़ी संरचनात्मक चुनौती से जूझ रही है, जिसे 'वेथहुड' (Waithood) कहा जा रहा है। लाखों युवा नौकरी करने के बजाय सालों तक सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में अपना कीमती समय बिता रहे हैं, जो सीधे तौर पर देश की उत्पादकता और जीडीपी ग्रोथ को प्रभावित कर रहा है।
भारत की विकास गाथा के सामने 'वेथहुड' एक शांत लेकिन गंभीर संकट बनकर उभरा है। इस शब्द का अर्थ है वह स्थिति जहां लाखों ग्रेजुएट युवा अपनी ऊर्जा को प्राइवेट सेक्टर में लगाने के बजाय सालों तक सरकारी परीक्षाओं के इंतजार में बिता देते हैं। यह मानव संसाधन का वह बटवारा है जो देश की आर्थिक प्रगति के लिए बेहद चिंताजनक है।\n\n### इकॉनमी पर भारी असर\n\nनिवेशकों और अर्थशास्त्रियों की नजर से देखें तो यह उत्पादकता का बड़ा नुकसान है। यदि कोई युवा 22 साल की उम्र के बजाय 27 साल की उम्र में वर्कफोर्स का हिस्सा बनता है, तो देश उसकी 5 साल की सबसे ऊर्जावान मेहनत खो देता है। यह सिर्फ एक व्यक्ति की सैलरी का नुकसान नहीं है, बल्कि यह कुल लाइफटाइम कमाई को कम करता है, जिसका सीधा असर हाउसहोल्ड कंजम्पशन पर पड़ता है।\n\n### कोचिंग माफिया और विरोधाभास\n\nइस पूरी कहानी में एक अजीब विडंबना है—कोचिंग इंडस्ट्री फल-फूल रही है जबकि छात्र अपनी लाइफ में स्टॉल (Stall) हो गए हैं। टेस्ट-प्रिप सेक्टर डबल डिजिट की दर से बढ़ रहा है और एक बड़े कॉर्पोरेट उद्योग में बदल चुका है। निवेशकों के लिए यह एक अजीब स्थिति है; कोचिंग कंपनियां तो बढ़ रही हैं, लेकिन जिस वर्कफोर्स को मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी और फाइनेंशियल सर्विसेज में योगदान देना चाहिए था, वह सिर्फ 'कोचिंग' के चक्र में फंसा हुआ है।\n\n### क्या है बड़ा रिस्क?\n\nNITI Aayog के डेटा के अनुसार, 'NEET' (Not in Employment, Education, or Training) आबादी का बढ़ता आंकड़ा भारत के डेमोग्राफिक डिविडेंड के लिए बड़ा रिस्क है। यदि युवा वर्कफोर्स का एक बड़ा हिस्सा लेबर मार्केट से बाहर रहता है, तो आईटी और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टरों में टैलेंट की कमी हो जाएगी, जिससे कंपनियों पर दबाव बढ़ेगा। परीक्षाओं की लंबी उम्र-सीमा (Age eligibility) युवाओं को इस 'वेथहुड' फेज में और लंबे समय तक बनाए रखती है। अगर शिक्षा और प्राइवेट सेक्टर की जरूरतों के बीच का गैप जल्द नहीं भरा गया, तो यह समस्या भारत के लेबर लैंडस्केप का एक स्थायी हिस्सा बन सकती है।
