WPI-CPI Inflation Gap: महंगाई का 10 साल का बड़ा गैप, क्या अब आम जनता की जेब पर पड़ेगा असर?

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorNeha Patil|Published at:
WPI-CPI Inflation Gap: महंगाई का 10 साल का बड़ा गैप, क्या अब आम जनता की जेब पर पड़ेगा असर?

भारत में होलसेल और रिटेल महंगाई का अंतर पिछले एक दशक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। अब तक कंपनियां लागत का बोझ खुद उठा रही थीं, लेकिन जल्द ही यह स्थिति बदल सकती है।

भारत में होलसेल और रिटेल महंगाई के बीच का अंतर पिछले एक दशक के रिकॉर्ड स्तर पर है। जहां होलसेल महंगाई 10% के करीब पहुंच गई है, वहीं रिटेल महंगाई 5% से नीचे बनी हुई है। इस आंकड़े का साफ मतलब है कि मैन्युफैक्चरर्स और कंपनियां अब तक कच्चे माल (raw material) की बढ़ी हुई कीमतों का बोझ खुद उठा रही हैं ताकि वे बाजार में अपनी हिस्सेदारी बचा सकें।

मार्जिन पर बढ़ रहा है दबाव

कई महीनों से कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स के दाम नहीं बढ़ा रही थीं, जिससे ग्राहकों को तो राहत मिली, लेकिन कॉर्पोरेट प्रॉफिट मार्जिन पर बुरा असर पड़ा है। अब यह रणनीति अपने अंतिम दौर में है। ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की लगातार ऊंची कीमतें और लॉजिस्टिक खर्चों ने कंपनियों के लिए प्रॉफिट बचाना मुश्किल कर दिया है।

RBI की पॉलिसी और निवेशकों के लिए संकेत

निवेशकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कंपनियां अब मार्जिन की कुर्बानी देना बंद कर दें तो क्या होगा? अगर कंपनियां अपनी लागत ग्राहकों पर डालती हैं, तो सीधे तौर पर रिटेल महंगाई बढ़ेगी। चूंकि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ब्याज दरें तय करते समय रिटेल महंगाई को देखता है, इसलिए कीमतों में उछाल आने पर केंद्रीय बैंक के लिए दरों को कम बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। इसका सीधा असर कंपनियों की लोन की लागत पर पड़ेगा।

इन सेक्टर्स पर रहेगी नजर

FMCG, ऑटोमोटिव और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स इस स्थिति से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। आने वाले क्वार्टरली नतीजों में निवेशकों को यह देखना होगा कि किन कंपनियों के पास 'प्राइसिंग पावर' है। जो कंपनियां डिमांड कम हुए बिना दाम बढ़ाने में सफल रहीं, वे मजबूत मानी जाएंगी। वहीं, अगर मार्जिन गिरता रहा, तो यह कंपनियों के लिए खतरे की घंटी है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.