ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ी चिंता, शहरी इलाके स्थिर
जनवरी 2026 में भारत की बेरोजगारी दर में 5% की मामूली बढ़ोतरी देखी गई, जो पिछले महीने यानी दिसंबर 2025 के 4.8% से थोड़ी ज्यादा है। यह वृद्धि मुख्य रूप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आई मंदी के कारण हुई है। फसल कटाई के बाद की सुस्ती और सर्दी के मौसम में निर्माण, कृषि और परिवहन जैसे क्षेत्रों में गतिविधियों के धीमे पड़ने से ग्रामीण बेरोजगारी दर 3.9% से बढ़कर 4.2% हो गई।
इसके विपरीत, शहरी इलाकों में बेरोजगारी दर में बहुत मामूली वृद्धि हुई, जो 6.7% से बढ़कर 7.0% रही। यह दिखाता है कि देश के शहरी और ग्रामीण हिस्सों में आर्थिक गतिविधियां अलग-अलग गति से चल रही हैं।
लेबर फोर्स में भागीदारी घटी, हतोत्साहित श्रमिकों का संकेत
बेरोजगारी दर के आंकड़ों के अलावा, लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट (LFPR) और वर्कर पॉपुलेशन रेशियो (WPR) में भी गिरावट देखी गई है। LFPR में कमी अक्सर 'हतोत्साहित श्रमिकों' (discouraged workers) की संख्या बढ़ने का संकेत देती है। ये वो लोग होते हैं जो नौकरी के अवसर न मिलने की उम्मीद में सक्रिय रूप से काम खोजना छोड़ देते हैं। मंत्रालय का कहना है कि यह मौसमी कारणों से हुआ है, लेकिन इन प्रवृत्तियों पर बारीक नजर रखने की जरूरत है।
लिंग आधारित असमानताएं और अल्पकालिक उतार-चढ़ाव
पुरुषों में बेरोजगारी दर जनवरी में स्थिर रही, लेकिन 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र की महिलाओं में यह दिसंबर की तुलना में थोड़ी बढ़ी है। हालांकि, मंत्रालय ने इसे 2025 के अप्रैल से दिसंबर के बीच देखे गए आंकड़ों की सीमा के भीतर एक अल्पकालिक उतार-चढ़ाव बताया है। हालिया आर्थिक सर्वेक्षणों के अनुसार, महिला श्रम बल भागीदारी दर 2017-18 के 23.3% से बढ़कर 2023-24 में 41.7% हो गई थी, लेकिन इस जनवरी के आंकड़े पर बारीकी से नजर रखनी होगी।
आर्थिक विकास और रोजगार का जुड़ाव
भारत की अर्थव्यवस्था के 7.5% से 7.8% तक बढ़ने का अनुमान है, लेकिन आर्थिक विकास का रोजगार सृजन से सीधा और मजबूत संबंध हमेशा नहीं रहा है। इसे 'जॉबलेस ग्रोथ' (jobless growth) भी कहते हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था का कृषि पर अधिक निर्भर होना और मौसमी उतार-चढ़ाव इसे और भी नाजुक बनाते हैं। दूसरी ओर, शहरी सेवाएं अधिक स्थिर दिखती हैं।
संरचनात्मक कमजोरियां और भविष्य का रास्ता
यह डेटा अर्थव्यवस्था की कुछ स्थायी कमजोरियों को भी उजागर करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में मौसमी कामों पर निर्भरता और हतोत्साहित श्रमिकों की बढ़ती संख्या चिंता का विषय है। महिलाओं को कार्यबल में शामिल करने के प्रयासों के बावजूद, उन्हें अभी भी अवैतनिक काम का बोझ उठाना पड़ता है, जो उनकी सक्रिय भागीदारी को प्रभावित कर सकता है।
भविष्य का नज़रिया
आंकड़ों की अधिक बार छपने वाली रिपोर्टें श्रम बाजार की गतिशीलता में नई अंतर्दृष्टि प्रदान करेंगी। नीतिगत समर्थन से महिला श्रम बल भागीदारी दर 2050 तक 55% तक पहुंचने की उम्मीद है, बशर्ते मौसमी कमजोरियों और संरचनात्मक बाधाओं को दूर किया जा सके।
