भारत अब अपनी इंडस्ट्रियल स्ट्रैटेजी को सिंपल असेंबली से आगे ले जाकर 'डीप मैन्युफैक्चरिंग' (Deep Manufacturing) की तरफ मोड़ रहा है। अब फोकस कंपोनेंट डेवलपमेंट, R&D और मजबूत सप्लाई चेन इंटीग्रेशन पर होगा।
भारत के मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ का अगला चरण अब सिर्फ असेंबली-लेड प्रोडक्शन से आगे निकलने की मांग कर रहा है। हालांकि प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम्स ने बड़े पैमाने पर रोजगार और स्केल तो खड़ा कर दिया है, लेकिन लंबी अवधि का लक्ष्य अब 'डीप मैन्युफैक्चरिंग' है। इसमें कंपोनेंट्स, टेस्टिंग, इंजीनियरिंग और रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) जैसी घरेलू क्षमताएं विकसित करना शामिल है।
असेंबली से वैल्यू एडिशन का सफर
निवेशकों के लिए असेंबली और वैल्यू-एडेड मैन्युफैक्चरिंग के बीच का अंतर समझना बहुत जरूरी है। असेंबली में अक्सर महंगे कंपोनेंट्स बाहर से मंगाकर उन्हें भारत में जोड़ा जाता है, जिससे प्रॉफिट मार्जिन ग्लोबल प्राइस फ्लक्चुएशन के प्रति रिस्की हो जाता है। असली ताकत तब आती है जब कंपनियां सेमीकंडक्टर्स या डिस्प्ले जैसे कंपोनेंट्स खुद भारत में बनाने लगती हैं। जो कंपनियां 'लोकल वैल्यू एडिशन' दिखा सकती हैं, उनका मार्जिन बेहतर होता है और वे इम्पोर्ट पर कम निर्भर रहती हैं।
इंडस्ट्रियल पॉलिसी और रिजल्ट्स
पहले प्रोटेक्शनिस्ट पॉलिसी और हाई इम्पोर्ट टैरिफ का इस्तेमाल डोमेस्टिक इंडस्ट्री को सहारा देने के लिए किया जाता था। लेकिन अब सहमति यह है कि सरकारी सपोर्ट सिर्फ रिजल्ट्स पर आधारित होना चाहिए। अब फोकस इस पर है कि कंपनियां एक्सपोर्ट ग्रोथ और टेक्नोलॉजी हासिल करके ग्लोबल लेवल पर कॉम्पिटिटिव बनें, ताकि उन्हें लंबे समय तक सब्सिडी की जरूरत न पड़े।
ट्रेड एग्रीमेंट्स और लॉजिस्टिक्स
भारत अब फ्री-ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTA) को इस नजरिए से देख रहा है कि वे इंडस्ट्री को ग्लोबल मार्केट तक कैसे पहुंचा सकते हैं। इसके अलावा, नॉन-टैरिफ बैरियर्स और जटिल कस्टम प्रक्रियाओं को डिजिटल और सरल बनाने की कोशिश हो रही है। यह सब 'चाइना प्लस वन' (China Plus One) स्ट्रैटेजी का हिस्सा है, ताकि भारतीय कंपनियां ग्लोबल सप्लाई चेन में मजबूती से फिट हो सकें।
निवेशकों के लिए काम की बातें
इंडस्ट्रियल सेक्टर को ट्रैक करने वाले निवेशकों को तीन चीजें देखनी चाहिए:
- कंपनियों की वर्टिकल इंटीग्रेशन स्ट्रैटेजी।
- मैनेजमेंट की कमेंट्री कि वे इम्पोर्ट पर अपनी निर्भरता कैसे कम कर रहे हैं।
- सरकारी स्तर पर रेगुलेटरी ईजिंग (जैसे आसान कस्टम क्लीयरेंस और यूनिफाइड स्टैंडर्ड्स) की प्रगति।
