सितंबर में भारत की रिटेल फूड इन्फ्लेशन **5.5%** के दो साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। इसकी मुख्य वजह चीनी और दूध की कीमतों में आया उछाल है। सप्लाई चेन की बाधाओं के कारण तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में आम आदमी की जेब पर बोझ बढ़ा है, जबकि उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में सरकारी दखल से स्थितियां काफी हद तक कंट्रोल में हैं।
महंगाई का क्षेत्रीय अंतर (Regional Divide)
देश में महंगाई का असर हर जगह एक जैसा नहीं है। शुगर इन्फ्लेशन जुलाई के 4.92% से बढ़कर सितंबर तक 30% तक पहुंच गई है। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं, क्योंकि वहां स्थानीय उत्पादन कम होने से उन्हें कर्नाटक और महाराष्ट्र से सप्लाई पर निर्भर रहना पड़ रहा है। ट्रांसपोर्टेशन की लागत ने यहां के रिटेल दाम काफी बढ़ा दिए हैं।
इसके उलट, उत्तर प्रदेश में स्थिति स्थिर है। इसका मुख्य कारण राज्य भर में फैली चीनी मिलों का नेटवर्क और सरकारी निगरानी है, जिसने कीमतों को बहुत ज्यादा बढ़ने से रोक रखा है।
दूध की कीमतों पर दबाव
दूध के मोर्चे पर भी कुछ राज्यों में काफी तनाव है। केरल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में दाम सबसे ज्यादा बढ़े हैं। इसकी बड़ी वजह चारे (Cattle feed) के दाम में डबल डिजिट की बढ़ोतरी और डीजल के महंगे दाम हैं, जिसने लॉजिस्टिक्स खर्च बढ़ा दिया है।
हालांकि, कर्नाटक ने यहाँ मिसाल कायम की है। राज्य सरकार द्वारा सहकारी डेयरी ब्रांडों को ₹6 प्रति लीटर की सब्सिडी दी जा रही है। इसका सीधा फायदा यह है कि वहां दूध के दाम पड़ोसी राज्यों के मुकाबले ₹8 से ₹10 तक कम हैं।
निवेशकों के लिए संकेत
इन्वेस्टर और मार्केट एक्सपर्ट्स के लिए यह एक चिंता का विषय है। फूड और बेवरेज सेक्टर की उन कंपनियों पर मार्जिन का दबाव बन सकता है जिनके लिए चीनी और डेयरी मुख्य रॉ मटीरियल हैं। इसके अलावा, खाने-पीने की चीजों में महंगाई बढ़ने से लोगों की डिस्पोजेबल इनकम कम होती है, जिसका असर दूसरे कंज्यूमर गुड्स की मांग पर भी पड़ सकता है। आने वाले समय में मानसून की स्थिति और सरकारी सब्सिडी की निरंतरता ही महंगाई को काबू में रखने में अहम भूमिका निभाएगी।
