भारत ने 2021 से कई देशों के साथ FTAs (Free Trade Agreements) साइन करके अपनी इकोनॉमिक स्ट्रैटेजी बदली है। इससे घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बूस्ट मिलने की उम्मीद है, जो लॉन्ग टर्म इन्वेस्टर्स के लिए बड़े अवसर पैदा कर रही है।
भारत अब ग्लोबल पावर डायनेमिक्स को देखते हुए एक ज्यादा फ्लेक्सिबल और ट्रांजैक्शनल इकोनॉमिक मॉडल की ओर बढ़ रहा है। सरकार की कोशिश है कि अमेरिका, यूरोप और अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ संतुलन बनाए रखा जाए। 2021 से जिस तरह से एक के बाद एक FTAs किए गए हैं, उनका सीधा मकसद टैरिफ कम करना और भारतीय कंपनियों के लिए ग्लोबल मार्केट का रास्ता आसान करना है।
एक्सपोर्ट सेक्टर पर असर
इन्वेस्टर्स के लिए इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा एंगल 'मार्केट एक्सेस' है। जब भारत किसी देश के साथ ड्यूटी कम करने का समझौता करता है, तो इंजीनियरिंग, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल और जेम्स एंड ज्वेलरी जैसे सेक्टर की कंपनियों को सीधा फायदा मिलता है। कम टैक्स बैरियर का मतलब है बेहतर प्रॉफिट मार्जिन। हालांकि, असली गेम इस बात पर टिका है कि क्या भारतीय कंपनियां इंटरनेशनल क्वालिटी स्टैंडर्ड्स के हिसाब से अपना प्रोडक्शन स्केल कर पाएंगी।
एनर्जी सिक्योरिटी और इनपुट कॉस्ट
सरकार की इस नई पॉलिसी में एनर्जी सिक्योरिटी सबसे अहम है। कच्चे माल और फ्यूल की सप्लाई चेन को सुरक्षित रखने के लिए कई देशों से रिश्ते मजबूत किए जा रहे हैं। ऑटोमोटिव, केमिकल और मैन्युफैक्चरिंग जैसी भारी इंडस्ट्रीज के लिए यह बहुत जरूरी है, क्योंकि एनर्जी की अस्थिर कीमतें सीधे मुनाफे पर चोट करती हैं।
रिस्क फैक्टर को न भूलें
ट्रेड एग्रीमेंट्स के अपने फायदे हैं, लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है। खुली अर्थव्यवस्था के साथ इम्पोर्ट बढ़ने का खतरा रहता है, जिससे छोटी कंपनियों को सस्ते विदेशी सामानों से कड़ी टक्कर मिल सकती है। साथ ही, अब भारतीय कंपनियों की परफॉरमेंस अमेरिका और यूरोप की डिमांड पर पहले से ज्यादा निर्भर होगी। निवेशकों को सलाह है कि वे मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स द्वारा जारी मंथली ट्रेड डेफिसिट और सेक्टर-स्पेसिफिक एक्सपोर्ट डेटा पर नजर रखें, क्योंकि यही वो इंडिकेटर्स हैं जो बताएंगे कि ये पॉलिसी सही दिशा में जा रही है या नहीं।
