एक नई स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि भारत से सैटेलाइट लॉन्च करने की लागत दुनिया में सबसे ज़्यादा है। यह भारत के स्पेस सेक्टर के लिए एक बड़ी चुनौती है।
भारत का स्पेस मिशन महंगा क्यों?
भारत, दुनिया के प्रमुख स्पेस-पावर देशों में से एक बनने की राह पर है, लेकिन एक नई स्टडी ने इस सपने पर पानी फेर दिया है। 'Economics Letters' जर्नल में छपी एक रिसर्च के मुताबिक, भारत से सैटेलाइट लॉन्च करने की लागत $13,302 प्रति किलोग्राम है, जो कि अमेरिका की $3,225 प्रति किलोग्राम की लागत से करीब 4 गुना ज़्यादा है। यह आंकड़ा उन दावों को झूठा साबित करता है कि भारत का स्पेस प्रोग्राम सबसे सस्ता है।
यह सच्चाई निवेशकों और इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा झटका है, खासकर तब जब भारत 2030 तक ग्लोबल स्पेस मार्केट का 8-10% हिस्सा हासिल करने का लक्ष्य रखे हुए है।
आखिर क्यों है इतनी महंगी लागत?
इसकी सबसे बड़ी वजह है 'इकोनॉमी ऑफ स्केल' (Economies of Scale) की कमी। स्पेस इंडस्ट्री में, रॉकेट के दोबारा इस्तेमाल और लॉन्च की फ्रीक्वेंसी (Frequency) बढ़ने से लागत काफी कम हो जाती है। स्टडी बताती है कि 2025 में भारत ने सिर्फ 5 स्पेस लॉन्च किए। इतनी कम फ्रीक्वेंसी की वजह से इंफ्रास्ट्रक्चर और रिसर्च के भारी फिक्स्ड कॉस्ट (Fixed Cost) को कम मिशनों पर फैलाना नामुमकिन हो जाता है।
इसके अलावा, भारत के रॉकेट, जिनमें NewSpace India Ltd (NSIL) और ISRO के रॉकेट शामिल हैं, छोटे पेलोड (Payload) ले जाते हैं। वहीं, SpaceX जैसी कंपनियां Falcon 9 जैसे बड़े, रियूजेबल (Reusable) रॉकेट का इस्तेमाल करती हैं, जो एक बार में ज़्यादा वजन कम दाम पर ले जा सकते हैं। भारत अभी तक पूरी तरह से रियूजेबिलिटी (Reusability) को बड़े पैमाने पर नहीं अपना पाया है, जिससे प्रति किलोग्राम लागत ज़्यादा बनी हुई है।
प्राइवेट सेक्टर पर असर और जोखिम
Skyroot Aerospace जैसी कंपनियों का विक्रम-1 रॉकेट लॉन्च करना, भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर के लिए एक बड़ा माइलस्टोन (Milestone) है। लेकिन स्टडी कहती है कि प्राइवेट प्लेयर्स के आने के बावजूद, लॉन्चिंग की हाई कॉस्ट (High Cost) मुनाफे के रास्ते में रोड़ा बनी हुई है। अगर ये कंपनियां इंटरनेशनल कंपनियों से मुकाबला करने लायक लागत कम नहीं कर पातीं, तो उन्हें ग्लोबल सैटेलाइट कस्टमर्स को लुभाने में मुश्किल होगी।
एक और बड़ा स्ट्रेटेजिक रिस्क (Strategic Risk) भी है। जैसे-जैसे हैवी-लिफ्ट सैटेलाइट लॉन्च की मांग बढ़ रही है, भारतीय कंपनियों और सरकार पर SpaceX जैसी विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहने का दबाव बढ़ सकता है। इससे भारत की लोकल लॉन्चिंग कैपेबिलिटी (Local Launching Capability) कमज़ोर हो सकती है।
आगे क्या?
इंडस्ट्री के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ISRO और प्राइवेट कंपनियां लॉन्च फ्रीक्वेंसी बढ़ा पाती हैं और रियूजेबल रॉकेट टेक्नोलॉजी (Reusable Rocket Technology) विकसित कर पाती हैं। जब तक लॉन्च वॉल्यूम (Launch Volume) और कॉस्ट-इफेक्टिव डिजाइन (Cost-effective Design) में बड़ा बदलाव नहीं आता, तब तक ग्लोबल कमर्शियल स्पेस मार्केट का बड़ा हिस्सा हासिल करना मुश्किल होगा। निवेशकों को रॉकेट रियूजेबिलिटी टेस्ट (Rocket Reusability Tests), आने वाले लॉन्च की फ्रीक्वेंसी और ISRO से प्राइवेट फर्मों को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (Technology Transfer) से जुड़ी पॉलिसी पर नज़र रखनी चाहिए।
