प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 'सप्तधारा' इकोनॉमिक रोडमैप फूड प्रोसेसिंग सेक्टर की तस्वीर बदलने के लिए तैयार है। इसका मकसद लोकल एग्री-प्रोड्यूस को हाई-वैल्यू बेवरेज एक्सपोर्ट्स में बदलकर ग्लोबल डिमांड को भुनाना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किया गया 'सप्तधारा' इकोनॉमिक रोडमैप भारत की एग्रीकल्चरल स्ट्रेटेजी में बड़ा बदलाव ला रहा है। इसका मुख्य लक्ष्य कच्चे माल (raw commodities) के एक्सपोर्टर से आगे बढ़कर वैल्यू-एडेड फूड और बेवरेज प्रोडक्ट्स का ग्लोबल हब बनना है। आंवला, हल्दी और अदरक जैसे जल्दी खराब होने वाले कृषि उत्पादों को प्रोसेस करके सरकार 15% से 25% तक होने वाले पोस्ट-हार्वेस्ट नुकसान को कम करना चाहती है।
नई टेक्नोलॉजी पर जोर
सरकार अब एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी जैसे 'हाई-प्रेशर प्रोसेसिंग' (HPP) और 'एसेप्टिक कोल्ड-फिलिंग' को बढ़ावा दे रही है। इससे बिना हानिकारक प्रिजर्वेटिव्स के उत्पादों की क्वालिटी बरकरार रहती है। देश की दिग्गज FMCG कंपनियां जैसे Tata Consumer Products, Dabur और ITC अपने नेचुरल और वेलनेस पोर्टफोलियो को लगातार बढ़ा रही हैं, जो इस सरकारी विजन के साथ मेल खाता है।
निवेशकों के लिए चुनौतियां और मौके
हालाँकि, यह राह आसान नहीं है। कोल्ड-चेन इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में भारी कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) की जरूरत है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय बाजारों जैसे वेस्टर्न यूरोप और नॉर्थ अमेरिका के कड़े सेफ्टी नॉर्म्स को पूरा करना एक बड़ी चुनौती है।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि जो कंपनियां रूरल फार्म प्रोक्योरमेंट से लेकर अर्बन रिटेल तक की सप्लाई चेन को मजबूती से जोड़ पाएंगी, वही लंबी रेस में टिकेंगी। क्विक-कॉमर्स के विस्तार से डिस्ट्रीब्यूशन लागत में कमी आई है, लेकिन कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और ग्लोबल कॉम्पिटिशन मुनाफे पर असर डाल सकते हैं। निवेशकों को अब इस बात पर नजर रखनी होगी कि कंपनियां सरकारी इंसेंटिव्स का फायदा कैसे उठाती हैं और अपनी प्राइसिंग पावर को कैसे बरकरार रखती हैं।
