साल 2026 में भारतीय रुपया लगातार दबाव में है। भले ही देश का करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) जीडीपी का सिर्फ **1%** है, लेकिन अमेरिकी ब्याज दरों और कॉरपोरेट हेजिंग के कारण RBI की पुरानी रणनीति अब एक नई चुनौती का सामना कर रही है।
सालों तक निवेशकों और इकोनॉमिस्ट्स का मानना था कि कम करंट अकाउंट डेफिसिट रुपये के लिए एक ढाल का काम करेगा। लेकिन 2026 में यह धारणा गलत साबित हो रही है। देश का डेफिसिट 0.5% से 1% के दायरे में होने के बावजूद, रुपया इस साल अब तक 5% से 7% तक टूट चुका है।\n\n### ग्लोबल कैपिटल का शिफ्ट\n\nरुपये पर सबसे बड़ा दबाव बाहरी कारकों का है। अमेरिकी सरकार के 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड्स 5% के आसपास बने हुए हैं। ऐसे में ग्लोबल इन्वेस्टर्स के लिए सुरक्षित अमेरिकी बाजार में पैसा लगाना ज्यादा फायदेमंद हो गया है, जिससे उभरते बाजारों (Emerging Markets) से निवेश कम हो रहा है।\n\n### इंपोर्ट पर निर्भरता और कॉरपोरेट डर\n\nभारत का इंपोर्ट-टू-जीडीपी रेशियो बढ़कर 25% पहुंच गया है, जिससे डॉलर की मांग बनी रहती है। अब कॉरपोरेट जगत का व्यवहार भी रुपये को कमजोर कर रहा है। इम्पोर्टर्स रुपये के और टूटने के डर से जल्दी डॉलर खरीद रहे हैं, जबकि एक्सपोर्टर्स अपने डॉलर होल्ड कर रहे हैं।\n\n### RBI की बदलती रणनीति\n\nRBI के पास $765.9 बिलियन का विदेशी मुद्रा भंडार है, लेकिन क्रूड ऑयल की ऊंची कीमतों (लगभग $100 प्रति बैरल) और लगातार हो रहे FPI आउटफ्लो के कारण केंद्रीय बैंक अब एकतरफा दखल देने के बजाय बाजार को 'टू-वे रिस्क' की ओर ले जा रहा है। इसका मतलब है कि अब RBI रुपये को एक निश्चित दायरे में रोकने के बजाय बाजार की चाल के अनुसार चलने देने की रणनीति अपना रहा है।\n\n### निवेशकों के लिए चेतावनी\n\nरुपये की कमजोरी से 'इंपोर्टेड इन्फ्लेशन' का खतरा बढ़ गया है। ईंधन और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे जरूरी सामान महंगे होने से कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ सकता है। निवेशकों को अब क्रूड ऑयल की कीमतों और FPI के रुझान पर पैनी नजर रखनी होगी।
