India Space FDI Rules: अब स्पेस सेक्टर में निवेश के लिए गृह मंत्रालय (MHA) की सुरक्षा मंजूरी ज़रूरी!

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorSaanvi Reddy|Published at:
India Space FDI Rules: अब स्पेस सेक्टर में निवेश के लिए गृह मंत्रालय (MHA) की सुरक्षा मंजूरी ज़रूरी!

भारत ने स्पेस सेक्टर में विदेशी निवेश (FDI) के नियमों को सख्त कर दिया है। अब कई तरह की गतिविधियों के लिए गृह मंत्रालय (MHA) से सुरक्षा मंजूरी लेना अनिवार्य होगा। निवेशकों को अब 12 हफ़्ते की डिजिटल अप्रूवल प्रक्रिया से गुज़रना होगा, जो इंडस्ट्री ग्रोथ को बढ़ावा देने के सरकारी इरादे और राष्ट्रीय सुरक्षा पर बढ़ते फोकस को दर्शाता है।

स्पेस सेक्टर में FDI के नियमों में बड़ा बदलाव

भारत का तेज़ी से बढ़ता प्राइवेट स्पेस सेक्टर अब रेगुलेटरी नियमों के नए ढांचे में आ गया है। विदेशी निवेश (FDI) के नियमों में किए गए बड़े बदलाव के तहत, अब इंडस्ट्री को और ज़्यादा मज़बूती और सुरक्षा के साथ आगे बढ़ाया जाएगा। हालांकि, स्पेस सेक्टर के कई हिस्सों में 100% तक विदेशी निवेश की इजाज़त जारी है, लेकिन डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (DPIIT) ने अपनी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) में बदलाव कर सुरक्षा जांच का दायरा बढ़ा दिया है।

अब MHA की मंजूरी ज़रूरी, जानिए क्यों?

मई 2026 से लागू हुए नए नियमों के अनुसार, जो विदेशी निवेशक सैटेलाइट ऑपरेशंस से आगे बढ़कर 'स्पेस' की ज़्यादातर गतिविधियों में हिस्सा लेना चाहते हैं, उन्हें अब गृह मंत्रालय (MHA) से सुरक्षा मंजूरी लेनी होगी। यह बदलाव ख़ास तौर पर उन प्रस्तावों पर लागू होता है, जिनमें लॉन्च व्हीकल और स्पेसपोर्ट जैसी चीजें शामिल हैं और जहां FDI की सीमा तय मानकों से ज़्यादा है। इसका मतलब है कि अब निवेशकों को कंपनी की पृष्ठभूमि, शेयरधारिता पैटर्न और मैनेजमेंट की जानकारी जैसी विस्तृत जानकारी सरकार को देनी होगी।

12 हफ़्ते की डिजिटल प्रक्रिया और नई चुनौतियाँ

इस अपडेट का एक अहम हिस्सा है डिजिटाइज़ेशन और समय-सीमा का निर्धारण। सरकार ने FDI एप्लीकेशन को प्रोसेस करने के लिए 12 हफ़्ते की तय समय-सीमा पेश की है, और सभी आवेदन अब नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम (NSWS) के ज़रिए सबमिट करने होंगे। इस पेपरलेस सिस्टम से ग्लोबल निवेशकों को ज़्यादा स्पष्टता मिलने की उम्मीद है, हालांकि सुरक्षा जांच की शर्तें भी कड़ी कर दी गई हैं। इसके अलावा, भारत के साथ ज़मीनी सीमा साझा करने वाले देशों से होने वाले निवेश पर एक खास फ्रेमवर्क लागू होगा, जिसमेंbeneficial ownership की गहरी जांच की जाएगी।

दोहरे रेगुलेशन की चुनौती

निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती दोहरे रेगुलेटरी ढांचे से निपटना है। कंपनियों को DPIIT के तहत सरकारी FDI अप्रूवल प्रक्रिया का पालन करने के साथ-साथ, राष्ट्रीय स्पेस रेगुलेटर IN-SPACe से भी ज़रूरी मंज़ूरी लेनी होगी। IN-SPACe पहले से ही राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कमर्शियल स्पेस एक्टिविटीज़ का मूल्यांकन करता है, और नए FDI SOP से इन दोनों रेगुलेटरी सिस्टम के बीच समन्वय बढ़ेगा। इससे अप्रूवल के दौरान डॉक्यूमेंटेशन का काम और लंबा हो सकता है।

हालांकि, इस बढ़ी हुई जांच से कंप्लायंस का काम थोड़ा मुश्किल हो सकता है, लेकिन यह स्पेस इकोसिस्टम को और ज़्यादा औपचारिक बनाने की सरकार की मंशा को भी दिखाता है। निवेशकों के लिए भविष्य में यह देखना अहम होगा कि 12 हफ़्ते की समय-सीमा का पालन असल में कितनी तेज़ी से होता है, खासकर उन जटिल प्रोजेक्ट्स के लिए जिनमें अंतरराष्ट्रीय पूंजी शामिल है। निवेशक इस बात पर भी नज़र रखेंगे कि सरकार, DPIIT अप्रूवल और IN-SPACe द्वारा दी जाने वाली ऑपरेशनल मंज़ूरी के बीच समन्वय को कितना बेहतर बनाती है ताकि प्रोजेक्ट में देरी को कम किया जा सके।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.