देश के बड़े जलाशयों में जल स्तर महज **72%** है, जो औसत से **12%** कम है। कमजोर मानसून के कारण **51** बांध आधे से भी कम भरे हैं, जिससे खेती और हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पावर उत्पादन पर बुरा असर पड़ सकता है।
भारत के जलाशयों में पानी का स्तर अब एक बड़ी आर्थिक चिंता बन गया है। भले ही कुल क्षमता का 72% पानी उपलब्ध है, लेकिन यह आंकड़ा 10-वर्षीय औसत से करीब 12% कम है।
यह कमी कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून का नतीजा है, जिसमें बारिश लॉन्ग-पीरियड एवरेज से 13% कम रही। देश के करीब 45% हिस्से में कम बारिश के चलते 51 प्रमुख बांध 50% से कम क्षमता पर हैं, जो आने वाले महीनों में जल प्रबंधन के लिए बड़ी चुनौती है।
कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर
सबसे बड़ा खतरा रबी की फसल पर है। सर्दियों की बुवाई के लिए सिंचाई का पानी बेहद जरूरी है। पानी की किल्लत के कारण खेती की लागत बढ़ सकती है और बुवाई का रकबा घट सकता है। निवेशकों के लिए यह चिंता का विषय है क्योंकि इसका असर सीधे तौर पर FMCG, ट्रैक्टर और ऑटोमोबाइल सेक्टर की ग्रामीण मांग पर पड़ सकता है। इसके अलावा, खाद और बीज कंपनियों की डिमांड में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
हाइड्रो-पावर सेक्टर की मुश्किलें
जल संकट का सीधा असर ऊर्जा क्षेत्र पर भी पड़ रहा है। कई हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पावर प्लांट पानी के स्तर पर निर्भर हैं। स्तर कम होने से कंपनियां कोयला या गैस जैसे थर्मल स्रोतों पर निर्भर हो रही हैं, जिससे उनके ऑपरेशनल कॉस्ट बढ़ सकते हैं।
क्षेत्रीय असमानता
दक्षिण भारत में स्थिति सबसे गंभीर है, जहां जल स्तर 50% से नीचे बना हुआ है। अब सबकी निगाहें इंडिया मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमेंट (IMD) की अपडेट्स पर हैं, क्योंकि अक्टूबर की बारिश आखिरी उम्मीद है। इसके अलावा, सरकारी पॉलिसी और कृषि बुवाई के डेटा पर नजर रखना निवेशकों के लिए जरूरी होगा।
