भारत के दक्षिण एशिया में बड़े क्रॉस-बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स अपनी समय-सीमा से पीछे चल रहे हैं, जिससे एक रणनीतिक खालीपन पैदा हो रहा है जिसे अन्य वैश्विक प्रतिस्पर्धी भर रहे हैं।
भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट' (Neighbourhood First) पॉलिसी के सामने इस वक्त बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। दक्षिण एशिया में कनेक्टिविटी बढ़ाने के इरादे से शुरू की गई सड़क, रेल और पोर्ट परियोजनाओं में हो रही देरी अब एक गंभीर मुद्दा बन चुकी है। यह केवल प्रशासनिक मामला नहीं है, बल्कि भारत की एक भरोसेमंद इंफ्रास्ट्रक्चर पार्टनर के रूप में साख पर भी सवाल उठा रहा है।
प्रोजेक्ट्स में देरी और बढ़ती लागत
'कालादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट' जैसी कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं डेडलाइन पर डेडलाइन मिस कर रही हैं। प्रोजेक्ट्स के पूरे होने में देरी से न केवल इनकी लागत बढ़ रही है, बल्कि इससे क्षेत्रीय व्यापार (Regional Trade) एकीकरण के अवसर भी हाथ से निकल रहे हैं।
वैश्विक प्रतिस्पर्धियों की बढ़ती धमक
दूसरी ओर, प्रतिस्पर्धी ताकतें कम समय में बड़े प्रोजेक्ट्स डिलीवर करके अपनी पैठ जमा रही हैं। उदाहरण के तौर पर, बांग्लादेश में हाल ही में चालू हुआ 'पद्म ब्रिज रेल लिंक' और म्यांमार के डीप-सी पोर्ट्स में अन्य वैश्विक खिलाड़ियों का निवेश, भारत की सुस्त रफ्तार की तुलना में अपनी कुशलता का लोहा मनवा रहा है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
बाजार के जानकारों के लिए यह स्थिति इंफ्रास्ट्रक्चर डिलीवरी से जुड़े जोखिमों को उजागर करती है। BIMSTEC और BBIN जैसे समूहों की सफलता इन्हीं फिजिकल कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स पर टिकी है। नेपाल की जलविद्युत परियोजनाओं से लेकर रेलवे लिंक्स तक, अगर प्रतिबद्धताएं समय पर पूरी नहीं हुईं, तो पड़ोसी देश फंडिंग और निर्माण के लिए दूसरे देशों की ओर रुख करने को मजबूर होंगे। अब निवेशकों की नजरें इस बात पर हैं कि क्या भारत सरकार इन प्रोजेक्ट्स के लिए कोई केंद्रीकृत निगरानी (Centralized Monitoring) और अप्रूवल सिस्टम लाती है या नहीं।
