वित्तीय वर्ष 2024 में भारत के रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) खर्च का एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पहली बार, प्राइवेट सेक्टर का R&D खर्च **51.8%** रहा, जो सरकारी योगदान **48.2%** से ज्यादा है। यह भारत के ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में **38वें** स्थान पर पहुंचने के साथ एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन निवेशकों को नौकरशाही की देरी और अकादमिक रिसर्च को कॉमर्शियल उत्पादों में बदलने की चुनौतियों पर भी गौर करना चाहिए।
प्राइवेट फंडिंग की ओर बड़ा कदम
भारत की इनोवेशन (Innovation) की कहानी एक बड़े बदलाव से गुजर रही है। देश ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में 2025 तक 38वें स्थान पर पहुंच गया है, लेकिन असली तस्वीर खर्च के आंकड़ों से सामने आती है। वित्तीय वर्ष 2024 में, रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) में प्राइवेट सेक्टर का निवेश कुल खर्च का 51.8% रहा, जिसने सरकारी योगदान 48.2% को पीछे छोड़ दिया। यह कुल निवेश लगभग ₹2.45 ट्रिलियन तक पहुंच गया, जो भारत की GDP का 0.84% है।
फंडिंग में बदलाव
पहले भारत में R&D का ज्यादातर खर्च सरकार उठाती थी, और कुल निवेश लंबे समय तक GDP के 0.64% के आसपास ही रहा था। यह नया आंकड़ा बताता है कि भारतीय कंपनियां R&D को फंड करने में ज्यादा सक्रिय हो रही हैं। यह बदलाव भारत को विकसित देशों के करीब लाता है, जहां प्राइवेट कंपनियां ही ज्यादातर तकनीकी इनोवेशन को आगे बढ़ाती हैं। निवेशकों के लिए, यह एक अहम संकेत है कि कंपनियां कॉम्पिटिटिव बने रहने के लिए प्रोडक्ट डेवलपमेंट और टेक्नोलॉजी को बेहतर बनाने पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं।
इनोवेशन का विरोधाभास
बढ़ती फंडिंग के बावजूद, भारत अभी भी एक 'इनोवेशन पैराडॉक्स' (Innovation Paradox) का सामना कर रहा है। देश में वैज्ञानिक प्रकाशनों की संख्या ज्यादा है और पेटेंट फाइलिंग में भी बढ़ोतरी हुई है, जो हाल के वित्तीय सालों में 68,000 से अधिक रही है। हालांकि, इस अकादमिक काम को कॉमर्शियल रूप से सफल उत्पादों में बदलना अभी भी एक चुनौती है। कई सरकारी रिसर्च संस्थानों और विश्वविद्यालयों को 'लैब-टू-मार्केट' (lab-to-market) गैप का सामना करना पड़ता है, जहां अच्छे आइडियाज बड़े पैमाने पर उत्पादन या कॉमर्शियल इस्तेमाल तक नहीं पहुंच पाते।
लगातार बनी हुई संरचनात्मक बाधाएं
संस्थागत समस्याएं दक्षता में बाधा डाल रही हैं। स्वतंत्र सर्वे बताते हैं कि शोधकर्ताओं को अक्सर ग्रांट (grant) की मंजूरी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है, और कुछ प्रशासनिक प्रक्रियाएं प्रोजेक्ट के कीमती समय में महीनों लगा देती हैं। यह नौकरशाही फंड के इस्तेमाल को अप्रभावी बनाती है। इसके अलावा, चीन जैसे देशों की तुलना में, जहां R&D पर खर्च GDP के 2% से अधिक है, भारत की R&D इंटेंसिटी (intensity) अभी भी कम है। यह अंतर बताता है कि भले ही फंडिंग के स्रोत विविध हो रहे हों, लेकिन वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए कुल निवेश को और बढ़ाने की जरूरत है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए
जो निवेशक फार्मास्यूटिकल्स (pharmaceuticals), आईटी (IT) और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग (advanced manufacturing) जैसे इनोवेशन पर निर्भर सेक्टर्स में पैसा लगाते हैं, उनके लिए R&D खर्च की गुणवत्ता उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि मात्रा। निवेशकों को यह देखना चाहिए कि कंपनियां अपने रिसर्च बजट को कितने प्रभावी ढंग से वास्तविक उत्पादों या लागत बचाने वाली तकनीकों में बदल रही हैं। इसके अलावा, रिसर्च को आसान बनाने वाली सरकारी नीतियों में बदलाव, खासकर ग्रांट और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (intellectual property) प्रक्रियाओं में देरी को कम करने के प्रयास, आने वाले वर्षों में देश के इनोवेशन माहौल के विकास के लिए महत्वपूर्ण संकेतक होंगे।
