भारत के रबी सीजन के लिए खतरे की घंटी बज गई है। अल नीनो (El Niño) के असर और मानसून में **15%** बारिश की कमी के कारण बुवाई पर बड़ा संकट मंडरा रहा है। जलाशयों का घटता स्तर एग्रोकेमिकल और ग्रामीण वित्त जैसे सेक्टरों के लिए चिंता का सबब बन गया है।
पानी का संकट और खेती पर असर
इंडिया मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमेंट (IMD) के पूर्वानुमानों ने रबी सीजन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। सितंबर के दूसरे हिस्से में कम बारिश की आशंका के साथ-साथ अल नीनो का प्रभाव 2027 की शुरुआत तक बने रहने की संभावना है। देश भर के मुख्य जलाशयों में पानी का लेवल पिछले साल के मुकाबले काफी कम हो गया है, जो गेहूं, सरसों और दालों की बुवाई के लिए बड़ा जोखिम है।
एग्रोकेमिकल और ग्रामीण फाइनेंस पर दबाव
इस सूखे का असर एग्रोकेमिकल और फर्टिलाइजर कंपनियों पर सीधा पड़ेगा, क्योंकि बुवाई के समय मांग कम होने से उनके रिवेन्यू ग्रोथ पर असर पड़ सकता है। साथ ही, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार जैसे राज्यों में काम करने वाली नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) और माइक्रोफाइनेंस संस्थानों के लिए भी चुनौती बढ़ गई है। घटती ग्रामीण आय से लोन रिकवरी में दिक्कत आ सकती है, जिससे लेंडर्स को क्रेडिट असेसमेंट सख्त करने पड़ेंगे।
खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ सकते हैं
सप्लाई चेन में हलचल को देखते हुए सरकार पहले ही अलर्ट मोड पर है। चीनी, गेहूं और दालों की पैदावार में कमी की आशंका के बीच सरकार ने ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट और स्टॉक-होल्डिंग लिमिट जैसे सख्त कदम उठाए हैं। आने वाले हफ्तों में बुवाई के डेटा और जलाशयों के लेवल पर निवेशकों की नजर बनी रहेगी, क्योंकि यह सीधे तौर पर महंगाई (Inflation) और कंज्यूमर स्पेंडिंग को प्रभावित करेंगे।
