भारतीय अर्थव्यवस्था अब विदेशी पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (FPI) की अस्थिरता से बचने के लिए एक नई रणनीति पर काम कर रही है। सरकार का लक्ष्य घरेलू रिसर्च और लंबी अवधि के रुपये-डिनॉमिनेटेड बॉन्ड्स को बढ़ावा देकर बाजार को ग्लोबल झटकों से सुरक्षित बनाना है।
भारतीय अर्थव्यवस्था में अब एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव देखने को मिल रहा है। विदेशी पूंजी के प्रवाह पर अत्यधिक निर्भरता की जगह अब एक ऐसा मॉडल तैयार किया जा रहा है, जो घरेलू निवेश और मजबूत रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) पर आधारित हो। निवेशकों के लिए यह बदलाव बाजार में आने वाली भारी उठा-पटक से राहत की खबर हो सकती है, क्योंकि ग्लोबल सेंटीमेंट या विदेशी ब्याज दरों में बदलाव का असर अब कम होगा।
R&D में निवेश और भविष्य की राह
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती अकादमिक रिसर्च और उसे कमर्शियल सफलता में बदलने के बीच के गैप को भरना है। ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में अपनी स्थिति सुधारने के लिए सरकार अब केवल इंसेंटिव तक सीमित नहीं रहना चाहती। मैन्युफैक्चरिंग से लेकर फार्मा सेक्टर तक, भविष्य की कॉम्पिटिटिवनेस इसी बात पर टिकी है कि हम अपने नवाचार (Innovation) को मार्केट तक कितनी तेजी से पहुंचाते हैं। निवेशकों के लिए इसका मतलब है कि भविष्य में उन कंपनियों का दबदबा बढ़ेगा जो इस घरेलू इनोवेशन इकोसिस्टम का हिस्सा होंगी।
'पेशेंट कैपिटल' (Patient Capital) का महत्व
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि विदेशी पोर्टफोलियो फ्लो अक्सर 'हॉट मनी' की तरह होते हैं, जो संकट के समय तेजी से बाजार से बाहर निकल जाते हैं। इसी जोखिम को कम करने के लिए अब 'पेशेंट कैपिटल' पर जोर दिया जा रहा है। पेंशन फंड, इंश्योरेंस कंपनियों और रिटेल निवेशकों को लंबी अवधि के रुपये-डिनॉमिनेटेड बॉन्ड्स में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
इस डोमेस्टिक बफर के बनने से रुपये की वैल्यू में आने वाली गिरावट और सप्लाई चेन की बाधाओं का असर हमारे फाइनेंशियल सिस्टम पर कम होगा। जब देश की ग्रोथ घरेलू बचत (Domestic Savings) से फंड होगी, तो इक्विटी मार्केट्स में स्थिरता आने की पूरी उम्मीद है।
निवेशकों के लिए संकेत
यह बदलाव रातों-रात नहीं होगा, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम होंगे। यदि घरेलू पूंजी का आधार मजबूत होता है, तो विदेशी बिकवाली का बाजार पर असर कम होगा। आने वाले समय में निवेशकों को टैक्स-एफिशिएंट सेविंग स्कीम्स और रिसर्च ग्रांट्स से जुड़ी पॉलिसी अपडेट्स पर नजर रखनी चाहिए। भारत का 'कैपिटल कंज्यूमर' से 'कैपिटल जनरेटर' बनने का सफर मार्केट में एक नई और टिकाऊ तेजी की नींव रख सकता है।
