भारत में प्राइवेट कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) का दौर तेज हो गया है। कॉर्पोरेट क्रेडिट ग्रोथ **18.1%** के स्तर पर पहुंच गई है, जो इस बात का संकेत है कि कंपनियां अब अपनी क्षमता (Capacity) बढ़ाने पर बड़ा दांव लगा रही हैं।
इंडस्ट्रियल विस्तार और बढ़ता कर्ज
भारतीय बैंकिंग सेक्टर में कॉर्पोरेट लेंडिंग की रफ्तार इस बात की गवाह है कि प्राइवेट सेक्टर अब एक नई विकास यात्रा के लिए तैयार है। अगस्त में बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए कर्ज में 21.6% की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि MSME सेक्टर के लिए यह आंकड़ा 25.5% रहा। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि छोटी से लेकर बड़ी कंपनियां, हर स्तर पर औद्योगिक गतिविधियां तेज हो रही हैं।
मशीनरी इम्पोर्ट में भारी तेजी
कंपनियों के बदलते मूड का सबसे बड़ा सबूत कैपिटल गुड्स का इम्पोर्ट है। 12 महीनों के दौरान यह आंकड़ा $66 बिलियन तक पहुंच गया है, जो कि 2021 फाइनेंशियल ईयर में महज $29 बिलियन था। इसके अलावा, ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन (GFCF) का GDP अनुपात 32.4% तक पहुंच चुका है, जो भविष्य के उत्पादन के लिए मजबूत नींव बनाता है।
ये 6 सेक्टर बन रहे हैं ग्रोथ इंजन
निवेश का मुख्य फोकस अब कुछ चुनिंदा हाई-ग्रोथ सेक्टर पर है। इनमें स्पेस, सेमीकंडक्टर्स, सोलर मैन्युफैक्चरिंग, डेटा सेंटर्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और एयरोस्पेस शामिल हैं। सरकारी इंसेंटिव्स और प्राइवेट सेक्टर की बढ़ती दिलचस्पी इन क्षेत्रों को एक नई ऊंचाइयों पर ले जा रही है। अनुमान है कि इन सेक्टरों के दम पर फाइनेंशियल ईयर 2027 और 2028 में नॉमिनल GDP में 11 से 12% तक की बढ़ोतरी हो सकती है।
अन्य मैक्रो संकेत
औद्योगिक गतिविधियों की मजबूती केवल कर्ज के आंकड़ों में ही नहीं, बल्कि बिजली की मांग में भी दिख रही है, जो अप्रैल-अगस्त के बीच 9.4% बढ़ी है। अगस्त में GST कलेक्शन में 14.8% का इजाफा और रियल एस्टेट की सेल्स में 7% की वृद्धि यह साबित करती है कि अर्थव्यवस्था में खपत का माहौल भी पूरी तरह बना हुआ है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
भले ही आंकड़े उत्साहजनक हैं, लेकिन निवेशकों को सावधानी बरतने की जरूरत है। यह देखना अहम होगा कि क्या कंपनियों का यह भारी-भरकम निवेश भविष्य में मुनाफे (Profit) में तब्दील हो पाता है। क्षमता विस्तार के साथ-साथ कंपनियों पर कर्ज का बोझ और ऑपरेशनल कॉस्ट का प्रबंधन ही तय करेगा कि यह तेजी टिकाऊ है या नहीं।
