साल 2011 से 2023 के बीच लगभग 50 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकले हैं, जिससे देश में मास-मार्केट कंजम्पशन का दायरा तेजी से बढ़ा है। हालांकि, स्थिर वेतन और युवाओं में बेरोजगारी जैसे मुद्दे भविष्य के लिए चुनौतियां बने हुए हैं।
भारत के आर्थिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। वर्ल्ड बैंक की अक्टूबर 2026 की 'Poverty & Equity Brief' रिपोर्ट के मुताबिक, $4.20 प्रतिदिन से कम आय वाले लोगों की संख्या जो 2011 में 57.7% थी, वह घटकर अब 16.1% पर आ गई है। इसका मतलब है कि देश के कंज्यूमर पिरामिड का आधार काफी चौड़ा हुआ है।
मास मार्केट के लिए अवसर
गरीबी में कमी का सीधा असर FMCG, किफायती हाउसिंग और एंट्री-लेवल फाइनेंशियल सर्विसेज पर पड़ेगा। जैसे-जैसे लोग गरीबी रेखा से ऊपर आ रहे हैं, जरूरी वस्तुओं की मांग में बढ़ोतरी हो रही है, जो लॉन्ग-टर्म में कंपनियों के लिए वॉल्यूम ग्रोथ का बड़ा जरिया बन सकती है।
आय और रोजगार की चुनौतियां
रिपोर्ट एक कड़वा सच भी बयां करती है। भले ही 2017 से 2023 के बीच 13.4 करोड़ नई नौकरियां पैदा हुई हों, लेकिन असली कमाई यानी 'Real Earnings' में कोई खास बढ़ोतरी नहीं देखी गई है। अधिकांश नौकरियां लो-प्रोडक्टिविटी वाले सेक्टर में हैं। निवेशकों को ध्यान देना चाहिए कि अगर महंगाई के मुकाबले वेतन नहीं बढ़ा, तो कंपनियों के लिए प्रीमियम उत्पादों को बेचना कठिन हो सकता है।
भौगोलिक असमानता और रिस्क
देश में अब भी गहरी असमानता है। टॉप 10% वर्कफोर्स की कमाई बॉटम 10% के मुकाबले 13 गुना ज्यादा है। गरीबी का 57% हिस्सा उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल तक के बेल्ट में केंद्रित है। ऐसे में जो कंपनियां ग्रामीण अर्थव्यवस्था या इन खास क्षेत्रों पर निर्भर हैं, उन्हें शहरी मार्केट की तुलना में अलग तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
युवाओं की चिंता
फिस्कल ईयर 2027 की पहली तिमाही में यूथ अनइंप्लॉयमेंट रेट 15.9% के स्तर पर रहा। युवाओं में बेरोजगारी एक बड़ा रिस्क है जो भविष्य की कंज्यूमर डिमांड पर असर डाल सकता है। निवेशकों के लिए सलाह है कि कंपनियों के रिजल्ट्स के साथ-साथ इन लेबर मार्केट ट्रेंड्स पर भी बारीकी से नजर रखें।
