भारत की प्रति व्यक्ति नेट नेशनल इनकम वित्त वर्ष 23 से 26 के बीच सालाना **6.6%** की दर से बढ़ी है। यह वृद्धि आर्थिक विस्तार और जनसंख्या वृद्धि में कमी का नतीजा है। जहां एक ओर इससे कर्जदारों की चुकौती क्षमता बेहतर हुई है और बैंकों के बैड लोन कम हुए हैं, वहीं दूसरी ओर **45.5%** तक पहुंचा घरेलू कर्ज (Household Debt) निवेशकों के लिए एक अहम पहलू बना रहेगा जिस पर नज़र रखनी होगी।
प्रति व्यक्ति आय में ऐतिहासिक उछाल
भारत की प्रति व्यक्ति नेट नेशनल इनकम (Per Capita Net National Income) अपने ऐतिहासिक उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। वित्त वर्ष 2023 से 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, यह सालाना औसतन 6.6% की दर से बढ़ी है। यह आंकड़ा पिछले दशकों में देखी गई किसी भी तेजी से काफी बेहतर है और देश की अर्थव्यवस्था में बड़े संरचनात्मक बदलावों की ओर इशारा करता है।
जनसंख्या और GDP का असर
इस शानदार वृद्धि के पीछे भारत की बदलती जनसांख्यिकी (Demographics) एक बड़ा कारण है। देश का GDP लगातार बढ़ रहा है, वित्त वर्ष 2025-26 के लिए वास्तविक GDP ग्रोथ 7.7% दर्ज की गई है, वहीं जनसंख्या वृद्धि घटकर करीब 0.9% सालाना रह गई है। जब अर्थव्यवस्था की ग्रोथ जनसंख्या की ग्रोथ से ज्यादा होती है, तो प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी स्वाभाविक है। यह दर्शाता है कि देश कम होती जनसंख्या के साथ ज्यादा आर्थिक मूल्य का सृजन कर रहा है, जिससे उच्च आय स्तर की राह साफ हो रही है।
बैंकिंग सेक्टर की सेहत और घरेलू कर्ज
आर्थिक बदलावों का असर वित्तीय क्षेत्र में भी दिख रहा है। बैंकों के ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (GNPAs) में भारी गिरावट आई है, जो 2007-08 के बाद सबसे कम स्तर पर हैं। इससे पता चलता है कि व्यवसाय और आम लोग पहले की तुलना में अपने लोन चुकाने में ज्यादा सक्षम हैं। खासकर रिटेल लेंडिंग (Retail Lending) में मजबूती देखी जा रही है, जहां ग्राहकों की संख्या बढ़ने के बावजूद डिफॉल्ट रेट (Default Rate) कम बना हुआ है।
हालांकि, इस अच्छी खबर के साथ एक चिंताजनक पहलू भी जुड़ा है। आय बढ़ने के साथ-साथ भारत में घरेलू कर्ज GDP का लगभग 45.5% तक पहुंच गया है। इसका मतलब है कि उपभोक्ताओं की खर्च करने की क्षमता और जीवनशैली काफी हद तक उधार पर निर्भर है। निवेशकों के लिए यह एक मिली-जुली तस्वीर पेश करता है। भले ही कर्ज चुकाने की क्षमता बढ़ी है, लेकिन ऊंचे कर्ज के स्तर के कारण अगर आय वृद्धि धीमी हुई या ब्याज दरें लंबी अवधि तक ऊंची बनी रहीं, तो घरेलू वित्त पर दबाव आ सकता है।
रोजगार की चुनौतियां और भविष्य का रुख
प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के बावजूद, भारतीय अर्थव्यवस्था को रोजगार के मोर्चे पर लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। बड़ी कंपनियां अपनी ग्रोथ के हिसाब से पर्याप्त नौकरियां पैदा नहीं कर पा रही हैं। निर्माण जैसे क्षेत्रों में मजदूरों की कमी और खाली पदों की अधिकता देखी जा रही है, जबकि कई मजदूर अभी भी गिग वर्क (Gig Work) या स्वरोजगार पर निर्भर हैं। इस असंतुलन के कारण GDP ग्रोथ का पूरा फायदा समाज के हर वर्ग तक नहीं पहुंच पा रहा है, जिससे समृद्धि के असमान वितरण की चिंताएं बढ़ रही हैं।
भविष्य में, निवेशकों और नीति निर्माताओं की नजर इस बात पर रहेगी कि क्या प्रति व्यक्ति आय में यह वृद्धि टिकाऊ है। इसके लिए घरेलू कर्ज का दीर्घकालिक रुझान, कॉर्पोरेट सेक्टर द्वारा औपचारिक रोजगार सृजन की क्षमता और 'मिडिल-इंकम ट्रैप' (Middle-Income Trap) से बचने की देश की प्रगति जैसे प्रमुख कारकों पर नजर रखनी होगी। यह वह स्थिति है जब कोई देश मध्य-आय वर्ग से उच्च-आय वाले विकसित देश बनने में संघर्ष करता है।
