नई रूरल जॉब स्कीम का कमाल! 11.4 करोड़ से ज्यादा 'पर्सन-डे' पूरे, अब वेज पर होगी चर्चा

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AuthorMehul Desai|Published at:
नई रूरल जॉब स्कीम का कमाल! 11.4 करोड़ से ज्यादा 'पर्सन-डे' पूरे, अब वेज पर होगी चर्चा

विक्सित भारत-गारंटी फॉर रोज़गार और आजीविका मिशन (VB-G RAM G) ने लॉन्च के बाद से **11.4 करोड़** 'पर्सन-डे' का आंकड़ा पार कर लिया है। खास बात ये है कि इसमें **61.5%** महिलाएं काम कर रही हैं। लेकिन अब एक संसदीय समिति ने महंगाई को देखते हुए रोज़ाना मजदूरी **₹400** करने की सिफारिश की है।

रूरल जॉब स्कीम में भारी भागीदारी

1 जुलाई 2026 को लॉन्च हुए विक्सित भारत-गारंटी फॉर रोज़गार और आजीविका मिशन (VB-G RAM G) ने ग्रामीण इलाकों में रोज़गार के मौके बनाने में ज़बरदस्त शुरुआत की है। इस नई स्कीम ने, जिसने महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट (MGNREGA) की जगह ली है, अब तक 11.4 करोड़ 'पर्सन-डे' (रोजगार के दिन) जेनरेट कर लिए हैं। खास बात यह है कि कुल काम करने वालों में 61.5% महिलाएं हैं, जो पिछले स्कीम की तरह ही ग्रामीण महिला श्रमिकों की मजबूत भागीदारी को दर्शाता है। इस स्कीम का मकसद योग्य ग्रामीण परिवारों को हर साल 125 दिनों का गारंटीड अनस्किल्ड मैनुअल काम देना है।

मजदूरी बढ़ाने की उठी मांग

ग्रामीण इलाकों में काम की ज़बरदस्त मांग को देखते हुए, स्कीम में अब वेज स्ट्रक्चर यानी मजदूरी की दरें चर्चा का विषय बन गई हैं। फिलहाल, सरकार ने ₹300 प्रति दिन की अंतरिम बेस वेज तय की है, और राष्ट्रीय औसत ₹327.4 प्रति दिन है। लेकिन, रूरल डेवलपमेंट पर बनी एक संसदीय स्थायी समिति ने चिंता जताई है कि मौजूदा दरें महंगाई और बढ़ती लागत-ए-ज़िंदगी को ठीक से कवर नहीं करतीं।

समिति ने वेज-डिटरमिनेशन के तरीके में बदलाव की सिफारिश की है। उनका कहना है कि एग्रीकल्चरल लेबरर्स के लिए कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI-AL) के लिए 2011 के बेस ईयर पर निर्भरता अब पुरानी हो चुकी है। समिति ने मौजूदा आर्थिक हालातों को ध्यान में रखते हुए मिनिमम वेज को बढ़ाकर ₹400 प्रति दिन करने का प्रस्ताव दिया है। उन्होंने रूरल डेवलपमेंट डिपार्टमेंट से तीन महीने के अंदर इस पर एक्शन-टेकन रिपोर्ट जमा करने को कहा है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर

इस स्कीम की सफलता और मजदूरी पर आने वाला फैसला ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए काफी अहम है। ग्रामीण आय, खासकर FMCG, टू-व्हीलर और ट्रैक्टर जैसे सेक्टर में कंज्यूमर डिमांड को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाती है। अगर सरकार सिफारिश के अनुसार मजदूरी ₹400 तक बढ़ाती है, तो ग्रामीण परिवारों की डिस्पोजेबल इनकम बढ़ सकती है, जिससे इन सेक्टर्स को फायदा होगा।

हालांकि, मजदूरी में बड़ी बढ़ोतरी से सरकार पर फिस्कल प्रेशर भी बढ़ेगा, क्योंकि इससे प्रोग्राम का कुल खर्च बढ़ जाएगा। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार ग्रामीण खरीद शक्ति का समर्थन करने की ज़रूरत और अपने फिस्कल टारगेट्स के बीच कैसे संतुलन बनाती है। इन्वेस्टर्स इस बात पर नज़र रख सकते हैं कि सरकार वेज मेथोडोलॉजी रिव्यू पर क्या अपडेट देती है और संसदीय सिफारिशों पर क्या प्रतिक्रिया देती है। इससे स्कीम के लॉन्ग-टर्म बजट और ग्रामीण खपत पर पड़ने वाले असर का पता चलेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.