भारत ने अपना कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) अपडेट कर बेस ईयर **2024** कर दिया है। इसमें **358** आइटम शामिल किए गए हैं, जो आधुनिक खपत को बेहतर दर्शाते हैं। लेकिन, नए स्ट्रक्चर में फ्यूल की कीमतों के अलग-अलग कैटेगरी में बंट जाने से कोर इंफ्लेशन का हिसाब लगाना अब टेढ़ी खीर हो गया है, जिसका असर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की पॉलिसी को समझने पर पड़ेगा।
भारत सरकार ने कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) का बेस ईयर 2012 से बदलकर अब 2024 कर दिया है। यह अपडेट 2023-24 के हाउसहोल्ड कंजम्पशन एक्सपेंडिचर सर्वे पर आधारित है, जिसका मकसद भारतीय अर्थव्यवस्था की बदलती तस्वीर को बारीकी से पेश करना है। नया इंडेक्स अंतरराष्ट्रीय COICOP 2018 क्लासिफिकेशन सिस्टम पर आधारित है, जिसमें 12 डिवीजनों के तहत 358 आइटम ट्रैक किए जा रहे हैं।\n\n### कोर इंफ्लेशन के सामने बड़ी चुनौती\n\nअर्थशास्त्रियों और इन्वेस्टर्स के लिए सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अब 'कोर इंफ्लेशन' का सटीक अंदाजा लगाना कठिन हो गया है। पहले फूड और फ्यूल के आंकड़ों को अलग करना आसान था, लेकिन नए फ्रेमवर्क में फ्यूल से जुड़े आइटम कई कैटेगरी में बिखरे हुए हैं। इससे एनालिस्ट्स को अब डेटा को मैन्युअली रिकंस्ट्रक्ट करना पड़ रहा है, जिससे स्वतंत्र ऑडिटिंग में बाधा आ रही है।\n\n### RBI की पॉलिसी और डेटा की कमी\n\nमार्केट के लिए यह मुद्दा अहम है क्योंकि RBI का पूरा फोकस इन इंफ्लेशन मेट्रिक्स पर होता है, जो ब्याज दरों (Interest Rates) का रास्ता तय करते हैं। इसके अलावा, मिड-2026 तक नई सीरीज का केवल 7 महीने का ही डेटा उपलब्ध है। इतने कम हिस्टोरिकल डेटा के साथ यह तय करना मुश्किल है कि महंगाई का मौजूदा ट्रेंड सामान्य है या असामान्य।\n\n### खपत के पैटर्न में बड़ा बदलाव\n\nनई सीरीज में फूड का वेटेज लगभग 46% से घटकर करीब 36% रह गया है, जबकि सर्विसेज, हाउसिंग और अन्य खर्चों का वेटेज बढ़ा है। हालांकि यह आधुनिक भारत को बेहतर दिखाता है, लेकिन पुराने और नए डेटा की तुलना करना अब और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है। जब तक सरकार स्पष्ट और कंसोलिडेटेड डेटा जारी नहीं करती, निवेशकों को स्वतंत्र अनुमानों में अंतर देखने के लिए तैयार रहना चाहिए।
