भारत का मानसून अब पहले जैसा नहीं रहा। बारिश अब 'लो-प्रेशर सिस्टम' (Low-pressure systems) पर ज्यादा निर्भर हो गई है, जिससे एक तरफ बाढ़ तो दूसरी तरफ सूखे के हालात पैदा हो रहे हैं। यह बदलाव ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महंगाई (Inflation) के लिए बड़ा रिस्क है।
भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाला मानसून अब एक बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव (Structural Change) से गुजर रहा है। मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, बारिश अब पूरे देश में समान रूप से नहीं फैल रही है। इसके बजाय, मानसून अब बंगाल की खाड़ी से उठने वाले अस्थिर 'लो-प्रेशर सिस्टम' पर ज्यादा निर्भर हो गया है।
क्यों बदल रही है बारिश की तस्वीर?
पुराने समय में मानसून पूरे उपमहाद्वीप में एक समान बारिश लाता था। लेकिन अब ये स्टॉर्म सिस्टम एक निश्चित ट्रैक पर चलते हैं, जो बंगाल की खाड़ी से शुरू होकर सेंट्रल कॉरिडोर के रास्ते उत्तर-पश्चिम की ओर जाते हैं। इसका नतीजा यह है कि इस रास्ते में आने वाले इलाकों में तो बाढ़ जैसे हालात बन जाते हैं, जबकि उत्तर-पूर्व और दक्षिण के कई हिस्से सूखे की मार झेल रहे हैं। कई बार पूरे देश का औसत आंकड़ा तो सामान्य दिखता है, लेकिन हकीकत में बड़े कृषि क्षेत्र सूखे की चपेट में होते हैं।
इकोनॉमी और महंगाई पर खतरा
भारत की कृषि पूरी तरह से बारिश के समय और वितरण पर निर्भर है। अगर बारिश का पैटर्न बिगड़ता है, तो खरीफ फसलों की बुवाई और कटाई प्रभावित होती है। चूंकि हमारी बड़ी आबादी खेती पर आश्रित है और कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) में फूड आइटम्स का वजन काफी अधिक है, इसलिए अनिश्चित मानसून सीधे तौर पर खाने-पीने की चीजों की महंगाई यानी 'फूड इन्फ्लेशन' को बढ़ाता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों और मार्केट पार्टिसिपेंट्स को अब केवल 'ऑल-इंडिया रेनफॉल' के आंकड़ों पर भरोसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये जमीनी हकीकत को पूरी तरह बयां नहीं करते। अब आपको राज्य-दर-राज्य फसल उत्पादन डेटा और जलाशय (Reservoir) के लेवल पर नजर रखनी होगी। जैसे-जैसे मौसम अनिश्चित होता जाएगा, ग्रामीण इकोनॉमी का लचीलापन इस बात पर निर्भर करेगा कि देश जल संसाधनों का प्रबंधन कैसे करता है और मौसम के इन तेजी से बदलते हालातों का सामना कैसे करता है।
