भारत का मेट्रो नेटवर्क अब **1,170 किमी** के आंकड़े को छू चुका है और अमेरिका से महज **216 किमी** पीछे है। फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए **₹30,000 करोड़** के बजट के साथ, अब फोकस टियर-2 शहरों पर है, जो कंस्ट्रक्शन और रेलिंग स्टॉक कंपनियों के लिए बड़े अवसर लेकर आया है।
भारत ने अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर में एक बड़ा मुकाम हासिल किया है। देश के 26 शहरों में अब कुल 1,170 किमी लंबा मेट्रो नेटवर्क ऑपरेशनल है। यह आंकड़ा अमेरिका के 1,386 किमी के नेटवर्क के बेहद करीब है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि 2027 तक भारत इस अंतर को पूरी तरह पाट सकता है।
रफ्तार में जबरदस्त उछाल
2014 से पहले की तुलना में मेट्रो निर्माण की गति 6 गुना से ज्यादा बढ़ चुकी है। पहले जहाँ हर महीने 1 किमी से भी कम ट्रैक बिछता था, वहीं अब यह आंकड़ा 6 किमी प्रति माह तक पहुंच गया है। सरकार ने फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए ₹30,000 करोड़ का बड़ा फंड आवंटित किया है।
किन कंपनियों को होगा फायदा?
यह इंफ्रास्ट्रक्चर पुश इंजीनियरिंग और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए गेम चेंजर साबित हो रहा है। Larsen & Toubro (L&T) जैसे बड़े प्लेयर्स सिविल कंस्ट्रक्शन संभाल रहे हैं, जबकि BEML, Titagarh Rail Systems और Alstom India जैसी कंपनियां मेट्रो कोच और सिग्नलिंग सिस्टम की डिमांड बढ़ने से सीधे तौर पर बेनिफिशियरी बनी हैं।
टियर-2 शहरों पर फोकस
अब मेट्रो केवल दिल्ली जैसे मेट्रो सिटी तक सीमित नहीं है। इंदौर, भोपाल, आगरा और कानपुर जैसे शहरों में काम तेजी से चल रहा है। इस विकेंद्रीकरण का मुख्य मकसद छोटे शहरों में ट्रैफिक समस्या को सुलझाना है। हालांकि, निवेशकों के लिए बड़ी चुनौती इन रूट्स की फाइनेंशियल सस्टेनेबिलिटी है। इन प्रोजेक्ट्स की सफलता के लिए अब सरकार केवल टिकटों पर निर्भर न रहकर रियल एस्टेट डेवलपमेंट और स्टेशन के आसपास कमर्शियल एक्टिविटी जैसे नॉन-फेयर रेवेन्यू मॉडल पर जोर दे रही है।
