भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर एक अनोखी चुनौती का सामना कर रहा है, जिसे 'कैपिटल इंटेंसिटी पैराडॉक्स' कहा जा रहा है। कंपनियां भले ही नई मशीनों और टेक्नोलॉजी पर भारी निवेश कर रही हों, लेकिन उनसे मिलने वाली एफिशिएंसी (दक्षता) में लगातार गिरावट देखी जा रही है। यह ट्रेंड नए बड़े प्रोजेक्ट्स को सीमित कर रहा है और जॉब ग्रोथ को भी प्रभावित कर रहा है।
क्यों घट रही है कैपिटल एफिशिएंसी?
इकोनॉमिस्ट्स के मुताबिक, भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 'कैपिटल इंटेंसिटी पैराडॉक्स' की समस्या गहराती जा रही है। हालिया इंडस्ट्री डेटा बताते हैं कि कंपनियां नई मशीनरी, टेक्नोलॉजी और प्लांट अपग्रेड पर खूब पैसा लगा रही हैं, लेकिन इस कैपिटल से होने वाले प्रोडक्शन (उत्पादन) में उस हिसाब से बढ़ोतरी नहीं हो रही है। असल में, कैपिटल एफिशिएंसी, यानी लगाए गए पैसे से मिलने वाला रिटर्न, FY09 में 19.4x से घटकर FY20 तक 9.4x रह गई है।
यह गैप बताता है कि ऑपरेशनल कॉस्ट (संचालन लागत) और लॉजिस्टिक्स की अड़चनों जैसी स्ट्रक्चरल दिक्कतों के कारण कंपनियों को अपनी मौजूदा पोजीशन बनाए रखने के लिए ज़्यादा कैपिटल लगाना पड़ रहा है। सीधे शब्दों में कहें तो, मैन्युफैक्चरर्स को उतना ही प्रोडक्शन करने के लिए ज़्यादा खर्च करना पड़ रहा है, जिससे उनके प्रॉफिट मार्जिन (मुनाफे का मार्जिन) पर दबाव आ रहा है और नए निवेशों का असर कम हो रहा है।
बिज़नेस एक्सपेंशन पर असर
इस सिचुएशन का कॉर्पोरेट स्ट्रैटेजी पर साफ असर दिख रहा है। कई सेक्टर्स की बैलेंस शीट अच्छी होने के बावजूद, कंपनियां नए ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स (पूरी तरह नए कारखाने) में निवेश करने से हिचकिचा रही हैं। इसके बजाय, वे ब्राउनफील्ड एक्सपेंशन (मौजूदा सुविधाओं को अपग्रेड या बड़ा करना) को ज़्यादा तरजीह दे रही हैं।
ब्राउनफील्ड एक्सपेंशन को प्राथमिकता देने का सीधा कारण कैपिटल पर घटता रिटर्न है। जब लॉजिस्टिक्स की लागत या मार्केट की वजह से किसी नए, बड़े प्रोजेक्ट की एफिशिएंसी कम रहने की उम्मीद होती है, तो बिज़नेस अपनी मौजूदा साइट्स पर ही जोखिम कम करना पसंद करते हैं, जहाँ इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन पहले से मौजूद है।
कंजम्पशन और जॉब्स का साइकिल
इस ट्रेंड का डोमेस्टिक कंजम्पशन (घरेलू खपत) से भी गहरा नाता है। जैसे-जैसे मैन्युफैक्चरिंग कैपिटल-इंटेंसिव होती जाती है, प्रति यूनिट आउटपुट पर कम वर्कर्स की ज़रूरत पड़ती है। इससे सेक्टर में फॉर्मल एम्प्लॉयमेंट (औपचारिक रोज़गार) की ग्रोथ सीमित हो जाती है। जब जॉब ग्रोथ रुक जाती है, तो हाउसहोल्ड इनकम (घरेलू आय) और ओवरऑल कंज्यूमर डिमांड उतनी तेजी से नहीं बढ़ पाती कि इन मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स की प्रोडक्शन कैपेसिटी को खपाया जा सके।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के डेटा भी इस बात का समर्थन करते हैं। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कैपेसिटी यूटिलाइजेशन (क्षमता उपयोग) FY16 से 70% से 75% के बीच ही रहा है। इससे एक फीडबैक लूप बनता है: कंपनियां नई कैपेसिटी बनाने से कतराती हैं क्योंकि कंज्यूमर डिमांड कम है, और डिमांड इसलिए कम बनी हुई है क्योंकि सेक्टर पर्याप्त नई, अच्छी क्वालिटी की नौकरियां पैदा नहीं कर पा रहा है जो कंजम्पशन को सहारा दे सकें।
आगे की राह
इस साइकिल को तोड़ने के लिए, इंडस्ट्री का फोकस प्रोडक्टिविटी (उत्पादकता) और स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स (ढांचागत सुधार) पर शिफ्ट हो रहा है। भले ही प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम और आत्मनिर्भर भारत जैसी सरकारी पहल कैपेसिटी बढ़ाने का लक्ष्य रखती हैं, लेकिन सेक्टर की लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी (दीर्घकालिक स्थिरता) टोटल फैक्टर प्रोडक्टिविटी (कुल कारक उत्पादकता) को बढ़ाने पर निर्भर करती है।
निवेशकों और मार्केट पार्टिसिपेंट्स को यह देखना होगा कि आने वाला कैपिटल स्पेंडिंग एफिशिएंसी में असली बढ़ोतरी लाता है या कंपनियां 'पैराडॉक्स' यानी ज़्यादा खर्च के बावजूद कम आउटपुट ग्रोथ से जूझती रहती हैं। असली प्रोग्रेस के लिए शायद बिज़नेस को सिर्फ कैपेसिटी बढ़ाने से आगे बढ़कर इनोवेशन और टेक्नोलॉजी पर ध्यान देना होगा, जो पूरी वैल्यू चेन में कैपिटल के इस्तेमाल को बेहतर बना सके।
