भारत के रजिस्टर्ड मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए FY25 का साल शानदार रहा है। नौकरियों की संख्या बढ़कर **2.10 करोड़** हो गई है और इकोनॉमिक वैल्यू में **9.59%** का उछाल दर्ज किया गया है।
रोजगार और इकोनॉमिक आउटपुट में तेजी
लेटेस्ट 'एनुअल सर्वे ऑफ इंडस्ट्रीज' के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में रोजगार का आंकड़ा पिछले फाइनेंशियल ईयर के 1.96 करोड़ से बढ़कर 2.10 करोड़ पर पहुंच गया है। यह 7% की सालाना वृद्धि को दर्शाता है। वहीं, इकोनॉमिक आउटपुट यानी ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) 9.59% बढ़कर ₹26.94 लाख करोड़ हो गया है। इस तेजी में बेसिक मेटल्स, ऑटोमोबाइल और फार्मा सेक्टर का योगदान 45% से ज्यादा रहा है।
मुनाफा बनाम लागत की चुनौती
कंपनियों ने इस दौरान अपनी कैपिटल स्पेंडिंग में 11.10% का इजाफा किया है। इस भारी निवेश के बावजूद सेक्टर का नेट प्रॉफिट 7.73% की दर से बढ़ा है, जो कंपनियों की परिचालन क्षमता को दर्शाता है। हालांकि, चिंता का विषय लेबर कॉस्ट है, जिसमें 12% की बढ़ोतरी देखी गई है। निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि क्या कंपनियां बढ़ती मजदूरी के बोझ को अपनी कीमतों में बढ़ोतरी के जरिए ग्राहकों पर डाल पाएंगी या फिर उत्पादकता बढ़ाकर मार्जिन बचाएंगी।
प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग हब्स पर नजर
देश की कुल मैन्युफैक्चरिंग वर्कफोर्स का 56% हिस्सा केवल पांच राज्यों में केंद्रित है—तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश और हरियाणा। अकेले तमिलनाडु में 41,221 इंडस्ट्रियल यूनिट्स हैं। निवेशकों के लिए यह एकाग्रता (concentration) जोखिम और अवसर दोनों लेकर आती है। किसी भी क्षेत्रीय पॉलिसी बदलाव या इंफ्रास्ट्रक्चर बाधाओं का सीधा असर इन राज्यों में मौजूद कंपनियों के शेयरों पर पड़ सकता है।
