भारत का ट्रांसपोर्ट सेक्टर एक बड़े रेगुलेटरी बदलाव के मुहाने पर है। शिपिंग कंपनियों को पोर्ट टर्मिनल के मालिकाना हक की छूट है, लेकिन एविएशन में यह पूरी तरह बैन है। नेशनल लॉजिस्टिक्स पॉलिसी के तहत अब सरकार इन नियमों में तालमेल बिठाने पर विचार कर रही है, जो इंफ्रास्ट्रक्चर निवेशकों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
भारत सरकार का सपना एक सीमलेस और मल्टी-मोडल लॉजिस्टिक्स नेटवर्क तैयार करने का है, लेकिन इस राह में एक बड़ा रोड़ा है—समुद्री (Maritime) और विमानन (Aviation) सेक्टर के अलग-अलग नियम। PM GatiShakti जैसी पहल के बावजूद, दोनों सेक्टरों के रेगुलेटरी माहौल में जमीन-आसमान का अंतर बना हुआ है, जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में लंबे समय के निवेश के लिए अनिश्चितता पैदा हो रही है।
समुद्री सेक्टर: वर्टिकल इंटीग्रेशन का दौर
भारत के समुद्री क्षेत्र में 'वर्टिकल इंटीग्रेशन' एक सामान्य चलन बन चुका है। यहाँ बड़ी शिपिंग कंपनियां अपने खुद के पोर्ट टर्मिनल चलाती हैं। Mediterranean Shipping Co. और Hapag-Lloyd जैसे ग्लोबल दिग्गजों ने भारत के पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश किया है। हालांकि, यह मॉडल जितनी सुविधाएं देता है, उतने ही जोखिम भी लाता है। डर इस बात का है कि कहीं कंपनियां अपने ही जहाजों को प्राथमिकता न देने लगें, जिससे मार्केट में मोनोपॉली बन सकती है और प्रतिस्पर्धा खत्म हो सकती है।
एविएशन का अलग नियम
इसके उलट, भारतीय विमानन क्षेत्र में सख्ती बरती जाती है। यहां एयरपोर्ट ऑपरेटरों को एयरलाइंस में हिस्सेदारी लेने से रोका जाता है ताकि निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बनी रहे। चूंकि फ्लाइट स्लॉट और टर्मिनल गेट्स सीमित संसाधन हैं, रेगुलेटर्स को डर रहता है कि मालिकाना हक होने पर भेदभाव बढ़ सकता है। हालांकि, इस पाबंदी के कारण कंपनियां अपने बिजनेस मॉडल में इनोवेटिव बदलाव नहीं कर पा रही हैं।
आगे की राह: रेगुलेटरी दुविधा
सरकार अब एक ऐसी नीति बनाने पर विचार कर रही है जो मल्टी-मोडल फ्रेमवर्क को सपोर्ट करे। बड़ी चुनौती यह है कि कैसे प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा दिया जाए और कैसे एकाधिकार (Monopoly) को रोका जाए। जानकारों का मानना है कि सरकार भविष्य में पूर्ण प्रतिबंध की जगह 'ट्रांसपेरेंट प्राइसिंग' और 'नॉन-डिस्क्रिमिनेटरी एक्सेस' पर जोर दे सकती है। निवेशकों के लिए अब अगले सरकारी कदम और कंपटीशन कानूनों का अपडेट देखना बेहद जरूरी होगा, क्योंकि यही चीजें इंफ्रास्ट्रक्चर एसेट्स की प्रॉफिटेबिलिटी तय करेंगी।
