भारत में आम आदमी को महंगाई से थोड़ी राहत नहीं मिली है। जुलाई महीने में खुदरा महंगाई दर बढ़कर **4.45%** पर पहुंच गई है, जिसका मुख्य कारण खाने-पीने की चीजों के दामों में आई तेजी है।
खाने-पीने की चीजों ने बढ़ाई मुश्किलें
कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) के आंकड़ों के मुताबिक, जून में 4.38% पर रही खुदरा महंगाई दर जुलाई में बढ़कर 4.45% हो गई है। इस बढ़ोतरी के पीछे सबसे बड़ा हाथ खाद्य पदार्थों का रहा, जिनकी महंगाई दर 5.52% तक पहुंच गई। हालांकि, यह आंकड़ा बाजार के जानकारों के अनुमानों के दायरे में ही है, लेकिन यह आम आदमी के बजट पर दबाव बनाए हुए है, खासकर अनाज और दालों जैसी जरूरी चीजों के दाम बढ़ने से।
RBI का रुख और इकोनॉमी का भविष्य
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) इन बढ़ती कीमतों पर पैनी नजर बनाए हुए है। हाल ही में अगस्त 2026 में हुई मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की मीटिंग में, केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखने का फैसला किया। RBI ने न्यूट्रल यानी तटस्थ रुख अपनाया है और भविष्य के फैसले डेटा के आधार पर लेने की बात कही है। इसी के साथ, RBI ने 2026-27 के लिए अपने महंगाई अनुमान को घटाकर 5% कर दिया है।
अर्थशास्त्री इस बात पर जोर दे रहे हैं कि खाद्य महंगाई के अलावा, 'कोर इन्फ्लेशन' यानी खाद्य और ईंधन को छोड़कर अन्य वस्तुओं की महंगाई पर भी बारीकी से नजर रखी जा रही है। चिंता यह है कि अगर घरेलू मांग मजबूत बनी रहती है, तो कंपनियां आने वाले महीनों में इनपुट कॉस्ट यानी उत्पादन लागत में बढ़ोतरी का बोझ ग्राहकों पर डाल सकती हैं। ऐसे में, थोक महंगाई का असर खुदरा कीमतों पर भी दिख सकता है, खासकर त्योहारी सीजन के आसपास।
बॉन्ड मार्केट पर असर
बॉन्ड मार्केट के निवेशकों के लिए, मौजूदा महंगाई के आंकड़े और RBI की स्थिर ब्याज दर नीति कुछ हद तक स्पष्टता लेकर आई है। 10-साल के सरकारी बॉन्ड यील्ड में 6.75% से 6.90% के दायरे में कारोबार की उम्मीद है। एक्सिस म्यूचुअल फंड जैसी कंपनियों के एक्सपर्ट्स का मानना है कि निकट अवधि में यील्ड अपने निचले स्तर पर हो सकते हैं, लेकिन बाहरी कारकों के आधार पर इनमें बढ़ोतरी की संभावना है। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अमेरिका जैसे देशों के महंगाई के आंकड़े भारतीय बॉन्ड यील्ड को प्रभावित कर सकते हैं।
निवेशक भविष्य में महंगाई के आंकड़ों और RBI के बयानों पर नजर रखेंगे ताकि यह समझा जा सके कि ब्याज दरों में कोई बदलाव कब हो सकता है। हालांकि कुछ अर्थशास्त्री इस फाइनेंशियल ईयर में दरों में कोई बदलाव न होने की उम्मीद कर रहे हैं, वहीं कुछ यह भी देख रहे हैं कि वैश्विक कमोडिटी की कीमतें और घरेलू मांग कैसे विकसित होती है, जिसके आधार पर 2027 की शुरुआत में दरों में बदलाव संभव है।
