भारत में फॉर्मल जॉब मार्केट का विस्तार, लेकिन महिलाओं की भागीदारी अब भी चुनौती

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AuthorNeha Patil|Published at:
भारत में फॉर्मल जॉब मार्केट का विस्तार, लेकिन महिलाओं की भागीदारी अब भी चुनौती

अप्रैल से जुलाई **2025** के बीच EPFO के जरिए देश में **6.9 मिलियन** नए लोग औपचारिक वर्कफोर्स से जुड़े हैं। युवा कामगारों की संख्या तो बढ़ रही है, लेकिन महिलाओं की कम भागीदारी और करियर की शुरुआत में ही नौकरी छोड़ने की दर चिंता का विषय बनी हुई है।

भारत का औपचारिक श्रम बाजार तेजी से आगे बढ़ रहा है। एम्प्लॉई प्रोविडेंट फंड ऑर्गेनाइजेशन (EPFO) में 6.9 मिलियन नेट सदस्य जुड़े हैं, जिसमें सिर्फ जुलाई महीने में ही 2.1 मिलियन लोगों का इजाफा हुआ है। यह डेटा अर्थव्यवस्था के तेजी से फॉर्मलाइज होने का संकेत है, लेकिन इस सफलता के पीछे एक गहरा जेंडर गैप भी छिपा है।

कम महिला भागीदारी की हकीकत

वर्कफोर्स प्रोवाइडर Quess Corp के हालिया आंकड़ों के अनुसार, उनकी कुल स्टाफिंग में महिलाओं की हिस्सेदारी महज 17 प्रतिशत है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत 34.3 प्रतिशत से काफी कम है। खास बात यह है कि 18 से 25 साल के युवा वर्कफोर्स में शामिल तो हो रहे हैं, लेकिन महिलाओं के लिए एंट्री लेवल पर अभी भी कई बाधाएं खड़ी हैं।

सेक्टर के हिसाब से बड़ा अंतर

जेंडर गैप हर जगह एक जैसा नहीं है। IT और उससे जुड़ी सर्विस इंडस्ट्री में महिलाओं की भागीदारी 32 प्रतिशत तक है, जबकि पब्लिक सेक्टर और एग्रीकल्चर जैसे क्षेत्रों में यह आंकड़ा सिंगल डिजिट यानी 10 प्रतिशत से भी नीचे है। इसके अलावा, महिलाओं में 'अर्ली-करियर एट्रिशन' (शुरुआती 3-6 महीनों में नौकरी छोड़ना) एक बड़ी चुनौती है। बार-बार हायरिंग और ट्रेनिंग के चलते कंपनियों की लागत पर भी असर पड़ रहा है।

समावेशी विकास की जरूरत

निवेशकों और नीति निर्माताओं के लिए यह डेटा एक चेतावनी है। भले ही डेमोग्राफिक डिविडेंड का फायदा मिल रहा हो, लेकिन महिलाओं को साथ लिए बिना भारत अपनी पूरी आर्थिक क्षमता हासिल नहीं कर पाएगा। कंपनियों के लिए अब चुनौती सिर्फ नई भर्तियां करना नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और लचीला वर्क एनवायरनमेंट बनाना है ताकि वे प्रतिभाओं को लंबे समय तक अपने साथ बनाए रख सकें।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.