भारत का तेजी से बढ़ता रोड इंफ्रास्ट्रक्चर (Road Infrastructure) अब सवालों के घेरे में है। नई सड़कों पर आई दरारें और खराब क्वालिटी, कंस्ट्रक्शन कंपनियों के लिए नई मुसीबतें खड़ी कर सकती हैं।
सड़क निर्माण में क्वालिटी पर उठते सवाल
भारत में पिछले कुछ सालों में रोड इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में जबरदस्त तेजी आई है। 2014 से 2025 के बीच सड़कों के नेटवर्क में 60% से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। लेकिन, इस रफ्तार के साथ अब क्वालिटी को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेस-वे जैसी नई बनी सड़कों पर भी दरारें और सतह का उखड़ना जैसी समस्याएं सामने आई हैं। इसने इस बात पर जोर दिया है कि कंस्ट्रक्शन की स्पीड और टिकाऊपन के बीच तालमेल बिठाना जरूरी है। निवेशकों और जानकारों का ध्यान अब सिर्फ नेटवर्क बढ़ाने पर नहीं, बल्कि बनाई जा रही संपत्तियों की क्वालिटी और टिकाऊपन पर भी जा रहा है।
'सबसे सस्ता बोलीदाता' मॉडल की छिपी हुई कीमत
इंडस्ट्री के एक्सपर्ट्स के बीच 'L1' यानी सबसे सस्ता बोली लगाने वाले को कॉन्ट्रैक्ट देने वाले मॉडल पर चर्चा हो रही है। इस सिस्टम में, सरकारी कॉन्ट्रैक्ट अक्सर सबसे कम दाम बताने वाली कंपनी को मिलते हैं। इसका मकसद सरकारी खर्च कम करना होता है, लेकिन यह कॉस्ट-कटिंग (Cost-Cutting) का एक चक्र बना सकता है। मार्जिन बचाने के लिए कंस्ट्रक्शन कंपनियां शायद सस्ते मटेरियल का इस्तेमाल करने या ड्रेनेज और डिजाइन स्पेसिफिकेशन्स (Specifications) से समझौता करने पर मजबूर हो सकती हैं। जब इन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में खराब क्वालिटी के कारण समय से पहले ही दिक्कतें आती हैं, तो इसका वित्तीय और प्रतिष्ठा का बोझ अक्सर कॉन्ट्रैक्टर्स पर ही पड़ता है, जिन्हें पेनाल्टी (Penalty) या बार-बार मरम्मत का खर्च उठाना पड़ सकता है।
वित्तीय और ऑपरेशनल रिस्क (Financial and Operational Risks)
सड़कों की क्वालिटी में गिरावट से इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के लिए कई तरह के रिस्क पैदा हो रहे हैं। पहला, मेंटेनेंस लायबिलिटी (Maintenance Liability) बढ़ने का खतरा है। अगर कंस्ट्रक्शन के तुरंत बाद ही कॉन्ट्रैक्टर्स को डिफेक्ट्स (Defects) के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है, तो उन प्रोजेक्ट्स का मुनाफा कम हो सकता है। दूसरा, सेक्टर में फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) 25 से 27 के बीच नेशनल हाईवे (National Highway) के आवंटन और कंस्ट्रक्शन की रफ्तार धीमी होने की उम्मीद है। अगर सरकारी एजेंसियां क्वालिटी कंट्रोल के नॉर्म्स (Norms) को सख्त करती हैं, तो तेज, कम लागत वाले एग्जीक्यूशन (Execution) पर ध्यान केंद्रित करने वाली कंपनियों के लिए मजबूत टेक्निकल कैपेबिलिटी (Technical Capability) और टिकाऊपन के बेहतर ट्रैक रिकॉर्ड वाले प्लेयर्स के खिलाफ प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो सकता है।
पब्लिक सेफ्टी और रेगुलेटरी फोकस (Public Safety and Regulatory Focus)
इस इंफ्रास्ट्रक्चर संकट का इंसानी लागत भी काफी ज्यादा है। ऑफिशियल आंकड़ों के मुताबिक, 2020 से 2024 के बीच गड्ढों से संबंधित 23,000 से ज्यादा एक्सीडेंट हुए, जिनमें लगभग 9,440 लोगों की मौत हुई। इन आंकड़ों ने तीखी आलोचना और सिस्टम में सुधार की मांग को बढ़ाया है। सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ने के साथ, नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (National Highways Authority of India) जैसे रेगुलेटर्स (Regulators) और एजेंसियों पर प्योर कॉस्ट-बेस्ड (Cost-Based) के बजाय क्वालिटी-बेस्ड टेंडर प्रोसेस (Tender Process) को प्राथमिकता देने का दबाव बढ़ने की संभावना है। व्यापक मार्केट के लिए, इसका मतलब यह हो सकता है कि सरकार सख्त ऑडिट रिक्वायरमेंट (Audit Requirements) लागू कर सकती है, जिससे अल्पावधि में प्रोजेक्ट में देरी हो सकती है, लेकिन सैद्धांतिक रूप से उन कंपनियों को फायदा होगा जो लॉन्ग-टर्म एसेट लाइफ (Long-term Asset Life) को प्राथमिकता देती हैं।
निवेशक इंफ्रास्ट्रक्चर स्पेस (Infrastructure Space) को देखते हुए इस बात पर नजर रख सकते हैं कि कंपनियां इन क्वालिटी चिंताओं के जवाब में अपनी एग्जीक्यूशन स्ट्रेटेजी (Execution Strategy) को कैसे समायोजित करती हैं। मुख्य बात यह होगी कि क्या भविष्य में सरकारी नीतियां उन कॉन्ट्रैक्टर्स का पक्ष लेती हैं जो बेहतर टेक्निकल कैपेबिलिटी दिखाते हैं, और डेवलपर्स अपनी बॉटम लाइन (Bottom Line) को प्रभावित किए बिना मेंटेनेंस की जिम्मेदारियों को कितनी प्रभावी ढंग से संभाल सकते हैं।
