भारत की Higher Education का विस्तार: बजट की कमी और शिक्षकों की भारी किल्लत से बढ़ा खतरा

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AuthorNeha Patil|Published at:
भारत की Higher Education का विस्तार: बजट की कमी और शिक्षकों की भारी किल्लत से बढ़ा खतरा

भारत में हायर एजुकेशन में नामांकन का आंकड़ा **4.5 करोड़** के पार पहुंच गया है, लेकिन फंड की कमी और शिक्षकों की कमी से शिक्षा की गुणवत्ता पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं।

भारत के उच्च शिक्षा सेक्टर में पिछले एक दशक में अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिला है। फाइनेंशियल ईयर 2024 तक नामांकन का आंकड़ा 4.5 करोड़ के स्तर पर पहुंच गया है और कॉलेजों व विश्वविद्यालयों के नेटवर्क में 47% की बढ़ोतरी हुई है। यह विकास जहां एक ओर पहुंच (accessibility) को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी ढांचे की कमियों को भी उजागर करता है।

बजट और संसाधनों का संकट

सेक्टर की सबसे बड़ी चिंता फंड की कमी है। उच्च शिक्षा पर सरकार का खर्च कुल बजट का घटकर 1% रह गया है, जो कि फाइनेंशियल ईयर 2018 में 1.6% था। जहां एक तरफ IIT और IIM जैसे प्रीमियर संस्थानों में प्लेसमेंट पैकेज ₹40 लाख तक पहुंच रहे हैं, वहीं देश का एक बड़ा हिस्सा संसाधनों की तंगी से जूझ रहा है।

शिक्षकों की कमी और क्षेत्रीय विषमता

शिक्षा की गुणवत्ता में आ रही गिरावट का मुख्य कारण शिक्षकों के पदों का खाली होना है। क्षेत्रीय असंतुलन का आलम यह है कि कुछ राज्यों में 'प्यूपिल-टीचर रेशियो' 57:1 तक है, जबकि केरल जैसे राज्यों में यह 14:1 के स्तर पर स्थिर है। यह साफ दर्शाता है कि डिग्री की संख्या तो बढ़ रही है, लेकिन संस्थान की लोकेशन के आधार पर शिक्षा की क्वालिटी में जमीन-आसमान का अंतर है।

गवर्नेंस और सुधार की जरूरत

अब नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) जैसे प्रशासनिक निकायों में बड़े सुधार की मांग उठ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसे सांविधिक (statutory) दर्जा देने से जवाबदेही बढ़ेगी। इसके अलावा, प्राइवेट सेक्टर को भी अपनी भूमिका बढ़ानी होगी ताकि शैक्षणिक आउटपुट और इंडस्ट्री की जरूरतों के बीच का बड़ा गैप खत्म किया जा सके। भविष्य में सरकार का एजुकेशन बजट और वोकेशनल ट्रेनिंग पर होने वाले नीतिगत फैसले इस सेक्टर की दिशा तय करेंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.