Kautilya Economic Conclave में मशहूर इकोनॉमिस्ट Daniel Waldenström ने कहा कि यूरोप अपनी भारी-भरकम रेगुलेशन के कारण सुस्ती की चपेट में है, जबकि भारत के एजुकेशन और टैक्स-फ्रेंडली कदम इसे AI युग में ग्रोथ का नया सेंटर बना रहे हैं।
नई दिल्ली में आयोजित 5वें Kautilya Economic Conclave में स्वीडिश इकोनॉमिस्ट Daniel Waldenström ने ग्लोबल इकोनॉमी की तस्वीर साफ की। उन्होंने बताया कि जहां यूरोप आज जटिल नियमों और भारी टैक्स के बोझ तले दबी हुई अर्थव्यवस्था बन गया है, वहीं भारत का ढांचा लंबी अवधि की ग्रोथ के लिए एक बेहतर ब्लूप्रिंट पेश कर रहा है।
यूरोप क्यों पड़ रहा है पीछे?
Waldenström के मुताबिक, यूरोप का मॉडल 'इकोनॉमिक इनर्शिया' यानी आर्थिक जड़ता का शिकार हो रहा है। उन्होंने साफ कहा कि वहां की रेड टेप (लालफीताशाही) और टैक्स का उलझा हुआ स्ट्रक्चर बिजनेस की रफ्तार को धीमा कर रहा है। ग्लोबल इन्वेस्टर्स के लिए यह समझना जरूरी है कि आज के दौर में वही देश आगे निकलेंगे जहां कैपिटल एलोकेशन और कॉर्पोरेट एफिशिएंसी के लिए माहौल बेहतर हो।
टैक्स पॉलिसी का असर
एक्सपर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि सरकारों को वेल्थ या इनहेरिटेंस टैक्स के बजाय कैपिटल इनकम—जैसे कि कॉर्पोरेट प्रॉफिट और डिविडेंड—पर ध्यान देना चाहिए। इससे निवेश को बढ़ावा मिलता है। भारत की नीतियां इसी दिशा में काम कर रही हैं, जो इसे टेक्नोलॉजिकल और एजुकेशनल सर्विसेज में एक बड़ा खिलाड़ी बनाती हैं।
AI के दौर में भारत की उम्मीदें
Waldenström का मानना है कि भारत की बड़ी और अंग्रेजी बोलने वाली वर्कफोर्स इसे ग्लोबल ऑटोमेशन का सबसे बड़ा लाभार्थी बनाती है। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी है कि इस रफ्तार को बनाए रखने के लिए फ्री ट्रेड और प्राइवेट प्रॉपर्टी राइट्स को मजबूत रखना होगा, खासकर तब जब दुनिया में जियो-पॉलिटिकल अनिश्चितता बढ़ रही हो। अंत में, ग्लोबल मार्केट्स में हाई इंटरेस्ट रेट्स और अन्य झटकों के बीच भारत की पॉलिसी स्टेबिलिटी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बनी रहेगी।
