India Growth Paradox: रिकॉर्ड खर्च के बावजूद क्यों नहीं संभल रहा शेयर बाजार?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
India Growth Paradox: रिकॉर्ड खर्च के बावजूद क्यों नहीं संभल रहा शेयर बाजार?

देश में जीडीपी ग्रोथ और फेस्टिव स्पेंडिंग के रिकॉर्ड के बावजूद भारतीय शेयर बाजार **25** साल की सबसे लंबी गिरावट का सामना कर रहे हैं। बढ़ती लागत और घटते प्रॉफिट मार्जिन ने निवेशकों के बीच चिंता बढ़ा दी है, जिससे इकॉनमी और मार्केट के बीच एक बड़ा गैप पैदा हो गया है।

भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय एक अजीब विरोधाभास में फंसी है। एक तरफ 7.8% की मजबूत जीडीपी ग्रोथ और शानदार जीएसटी कलेक्शन जैसे आंकड़े दिख रहे हैं, तो दूसरी तरफ शेयर बाजार 25 सालों की अपनी सबसे खराब स्थिति से गुजर रहा है।\n\n### मार्जिन पर दबाव\nउपभोक्ताओं का खर्च तो बढ़ रहा है, लेकिन कंपनियों के लिए बिजनेस करना महंगा हो गया है। ग्लोबल लेवल पर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें और फ्रेट खर्च बढ़ने से कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर बुरा असर पड़ा है। अब स्थिति यह है कि कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ सीधे ग्राहकों पर डालने की स्थिति में नहीं हैं। इसका खामियाजा HUL, ITC और Godrej Consumer जैसी बड़ी कंपनियों को भुगतना पड़ा है, जिनका सितंबर 2026 तक लगभग ₹4 लाख करोड़ का मार्केट कैप साफ हो गया है।\n\n### अर्निंग्स गैप और FPI की बिकवाली\nनिवेशकों को अब यह अहसास हो रहा है कि देश की मजबूत ग्रोथ का मतलब हर बार कंपनियों के मुनाफे में बढ़ोतरी नहीं होता। इसके ऊपर से विदेशी संस्थागत निवेशकों (FPIs) की तरफ से बिकवाली का भारी दबाव है। साल 2026 के शुरुआती नौ महीनों में FPIs ने भारतीय बाजार से ₹3 लाख करोड़ से ज्यादा निकाले हैं, जिससे शेयरों की कीमतों पर लगातार दबाव बना हुआ है।\n\n### कंजम्पशन फाइनेंस का जोखिम\nबाजार में इस बात पर भी बहस छिड़ी है कि क्या मौजूदा मांग टिकाऊ है। काफी हद तक खर्च पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड के जरिए हो रहा है। अगर क्रेडिट ग्रोथ धीमी होती है या ब्याज दरें ऊंची बनी रहती हैं, तो यह मांग लंबी अवधि तक कायम नहीं रह पाएगी। निवेशकों की नजर अब अगली तिमाही के नतीजों पर है, जिससे पता चलेगा कि क्या कॉर्पोरेट इंडिया अपनी प्रॉफिटेबिलिटी को दोबारा ट्रैक पर ला पाएगा या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.