Green Finance Taxonomy: सरकारी सुस्ती से निवेशकों की बढ़ी चिंता, क्या टूटेगा नेट-जीरो का सपना?

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Green Finance Taxonomy: सरकारी सुस्ती से निवेशकों की बढ़ी चिंता, क्या टूटेगा नेट-जीरो का सपना?

भारत में अब तक एक तय 'ग्रीन फाइनेंस टैक्सोनॉमी' (Green Finance Taxonomy) न होने के कारण निवेशकों और एक्सपोर्टर्स के सामने बड़ी उलझन पैदा हो गई है। बिना किसी स्पष्ट बेंचमार्क के, कंपनियों पर कैपिटल कॉस्ट का बोझ बढ़ रहा है और यूरोपीय देशों के सख्त ट्रेड नियमों को पूरा करना चुनौतीपूर्ण हो गया है।

भारत का 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करना अब एक नई बाधा का सामना कर रहा है। सरकार की ओर से अभी तक किसी भी प्रकार की वैधानिक (statutory) ग्रीन फाइनेंस टैक्सोनॉमी को अंतिम रूप नहीं दिया गया है। हालांकि सरकार का इरादा 2027 फाइनेंशियल ईयर के अंत तक एक ढांचा तैयार करने का है, लेकिन एक कानूनी रूप से बाध्यकारी स्टैंडर्ड की कमी वित्तीय जगत में अनिश्चितता बढ़ा रही है।

क्यों जरूरी है टैक्सोनॉमी?

टैक्सोनॉमी एक तरह का क्लासिफिकेशन सिस्टम है, जो यह तय करता है कि कौन सी इकोनॉमिक एक्टिविटी वास्तव में पर्यावरण के अनुकूल है। इसकी अनुपस्थिति में Reserve Bank of India, SEBI और Ministry of Corporate Affairs के नियम आपस में टकराते दिखते हैं। निवेशकों के लिए 'ग्रीनवॉशिंग' (Greenwashing) का रिस्क बढ़ गया है और कंपनियों को अपने ग्रीन क्रेडेंशियल्स साबित करने के लिए थर्ड-पार्टी वेरिफिकेशन पर मोटा खर्च करना पड़ रहा है, जिससे कैपिटल कॉस्ट में भारी इजाफा हुआ है।

एक्सपोर्टर्स पर सीधा असर

मुश्किल सिर्फ घरेलू स्तर तक सीमित नहीं है। European Union के Carbon Border Adjustment Mechanism (CBAM) के जनवरी 2026 से लागू होने और EU Deforestation Regulation (EUDR) के दिसंबर 2026 तक आने से भारतीय स्टील, एल्युमीनियम और एग्री-कमोडिटी एक्सपोर्टर्स पर दबाव बढ़ गया है। बिना किसी नेशनल रोडमैप के, भारतीय कंपनियां इन अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने में पिछड़ सकती हैं, जिससे उनका यूरोपीय बाजार में बिजनेस करना कठिन हो सकता है।

$6.5 ट्रिलियन की फंडिंग गैप

भारत के नेट-जीरो लक्ष्यों के लिए अनुमानित $6.5 ट्रिलियन के फाइनेंसिंग गैप को भरने के लिए एक सरकारी सपोर्ट वाली टैक्सोनॉमी की सख्त जरूरत है। फिलहाल, बैंक केवल ICMA Green Bond Principles जैसे अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों पर निर्भर हैं, जो कि किसी घरेलू कानून का विकल्प नहीं बन सकते। निवेशकों की नजर अब Ministry of Finance के अगले कदमों पर है कि वे कब तक इस पारदर्शी फ्रेमवर्क को लागू करते हैं ताकि अंतरराष्ट्रीय क्लाइमेट फाइनेंस को आकर्षित किया जा सके।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.