भारत के रियल एस्टेट सेक्टर में सस्टेनेबिलिटी अब सिर्फ कागजी खानापूर्ति नहीं, बल्कि एक बड़ी बिजनेस स्ट्रैटेजी बन गई है। साल **2030** तक ग्रीन बिल्डिंग मटेरियल मार्केट के **$80 बिलियन** तक पहुंचने का अनुमान है, जिससे निवेशकों का ध्यान अब लॉन्ग-टर्म वैल्यू पर है।
भारत में रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन का चेहरा तेजी से बदल रहा है। अब डेवलपर्स के लिए पर्यावरण के अनुकूल निर्माण सिर्फ सरकारी नियमों का पालन नहीं, बल्कि सीधे मुनाफे से जुड़ा है। जिन प्रोजेक्ट्स के पास ग्रीन सर्टिफिकेट्स हैं, वहां रेंटल इनकम में सामान्य बिल्डिंग्स के मुकाबले 8% तक का प्रीमियम देखा जा रहा है। यही वजह है कि अब बड़े इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स ऐसी प्रॉपर्टीज को प्राथमिकता दे रहे हैं जो भविष्य के लिए सुरक्षित हैं।
लंबी अवधि का निवेश और फंडिंग
जो प्रॉपर्टीज पर्यावरण के मानकों पर खरी नहीं उतर रही हैं, उनमें भविष्य में लिक्विडिटी कम होने का खतरा मंडरा रहा है। वहीं, जो कंपनियां ग्रीन सर्टिफिकेशन ले रही हैं, उन्हें बैंकों और फाइनेंसर्स से आसानी से और सस्ते रेट्स पर कैपिटल मिल रहा है। आज लेंडर्स लोन देने से पहले ESG (Environmental, Social, and Governance) बेंचमार्क्स को सख्ती से देख रहे हैं, जिससे सस्टेनेबल प्रोजेक्ट्स बनाने वाली कंपनियों का पोर्टफोलियो सुरक्षित हो गया है।
सरकारी और नियामक बदलाव
सरकार भी इस बदलाव की बड़ी धुरी बनी हुई है। साल 2023 के बाद से भारत सरकार ने सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड्स के जरिए ₹72,697 करोड़ से ज्यादा का फंड जारी किया है। इसके अलावा, SEBI का BRSR (Business Responsibility and Sustainability Report) फ्रेमवर्क अब कॉरपोरेट गवर्नेंस का अहम हिस्सा बन चुका है। बड़ी कंपनियों के लिए अब अपने पर्यावरण पर पड़ने वाले असर की पूरी रिपोर्ट देना अनिवार्य है।
एक्सपोर्ट और ग्लोबल दबाव
यह असर सिर्फ बिल्डिंग्स तक सीमित नहीं है। यूरोपियन यूनियन के CBAM (Carbon Border Adjustment Mechanism) जैसे नियमों ने स्टील, सीमेंट और एल्युमीनियम बनाने वाली कंपनियों की चुनौतियां बढ़ा दी हैं। ग्लोबल मार्केट में टिके रहने के लिए भारतीय कंपनियों को अब अपने प्रॉडक्शन में कार्बन एमिशन कम करना ही होगा, वरना वे अपनी कॉम्पिटिटिव एज खो देंगी।
बाजार की चुनौतियां
सब कुछ आसान नहीं है। खासकर मिड-साइज डेवलपर्स के लिए टियर-2 और टियर-3 शहरों में इको-फ्रेंडली मटेरियल की सप्लाई चेन अभी भी कमजोर है। इसके अलावा, शुरुआती सर्टिफिकेशन कॉस्ट और प्रोजेक्ट डेटा की कमी के कारण निवेशकों के लिए ROI (Return on Investment) का सही मॉडल बनाना अभी भी एक पहेली बना हुआ है। आने वाले समय में वही कंपनियां जीतेंगी जो अपनी सप्लाई चेन को दुरुस्त कर इस ग्रीन बदलाव को मुनाफे में बदल पाएंगी।
