भारत में फूडग्रेन का उत्पादन 2024-25 में **358 मिलियन टन** के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, लेकिन बढ़ती लागत के कारण किसानों की कमाई में कोई खास उछाल नहीं आया है। इस बदलाव ने एग्री-इनपुट कंपनियों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है।
भारत का फूडग्रेन उत्पादन 2024-25 के दौरान 358 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर को छू गया है। हालांकि यह आंकड़ा देश की फूड सिक्योरिटी के लिए बेहतरीन है, लेकिन इससे किसानों की समृद्धि में कोई बड़ी बढ़ोतरी नहीं हुई है। ताजा डेटा के मुताबिक, खेती से होने वाली आय पर दबाव बना हुआ है, जिसके चलते कई ग्रामीण परिवार अब अपनी कुल कमाई के लिए खेती से इतर अन्य स्रोतों पर निर्भर हैं।
निवेशकों के लिए बदल रहा है बाजार
एग्रीकल्चर सेक्टर पर नजर रखने वाले निवेशकों के लिए बिजनेस मॉडल में बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। अब तक कंपनियां जो जेनेरिक फर्टिलाइजर या बीज बेचकर बड़ा वॉल्यूम कमाती थीं, उन्हें अब अपनी रणनीति बदलने की जरूरत है। किसान अब बदलते मौसम के जोखिमों को देखते हुए ऐसे प्रोडक्ट्स की मांग कर रहे हैं जो ज्यादा रेजिलिएंट (Resilient) और वैल्यूएबल हों।
क्या है प्राइवेट कंपनियों की नई चाल?
प्राइवेट कंपनियां अब इस बदलाव को भांप चुकी हैं। अब सिंपल यील्ड-बेस्ड प्रोडक्ट्स के बजाय ऐसी हाइब्रिड वैरायटी पर फोकस बढ़ रहा है जो बेमौसम बारिश या सूखे को झेल सकें। हाइब्रिड सब्जियों जैसे सेगमेंट में कंपनियां काफी अच्छा कर रही हैं, क्योंकि किसान बेहतर इनोवेशन के लिए प्रीमियम चुकाने को तैयार हैं।
क्लाइमेट वोलेटिलिटी का जोखिम
सेक्टर के लिए 'क्लाइमेट वोलेटिलिटी' सबसे बड़ा रिस्क बना हुआ है। मानसून की अनियमितता और El Nino जैसे मौसमी बदलावों के कारण एग्री-इनपुट कंपनियों का सेल्स साइकिल काफी वोलेटाइल रहता है। अगर मौसम खराब होने से फसल खराब होती है, तो इनपुट की मांग में अचानक गिरावट आ जाती है, जिसका सीधा असर कंपनियों के क्वार्टरली रेवेन्यू पर पड़ता है।
भविष्य में, निवेशकों को केवल नेशनल आउटपुट के आंकड़ों पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि कौन सी कंपनियां R&D में बेहतर निवेश कर रही हैं। जो कंपनियां बेसिक इनपुट्स के बजाय इंटीग्रेटेड सॉल्यूशंस (जैसे मिट्टी की सेहत और वॉटर मैनेजमेंट) पर फोकस करेंगी, वही लंबी अवधि में बाजार में अपनी जगह बनाए रखेंगी।
