Gig Economy: भारत में गिग वर्कर्स की बढ़ती संख्या और सख्त होते नियम, निवेशकों के लिए क्या हैं खतरे?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Gig Economy: भारत में गिग वर्कर्स की बढ़ती संख्या और सख्त होते नियम, निवेशकों के लिए क्या हैं खतरे?

भारत की गिग इकोनॉमी **2029-30** तक **2.35 करोड़** वर्कर्स तक पहुँचने की राह पर है। हालांकि, इस तेज ग्रोथ के साथ ही एल्गोरिदम और वर्कर्स की सुरक्षा पर उठते सवालों ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।

भारत की गिग इकोनॉमी एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है, जहाँ तेज विस्तार के साथ-साथ सिस्टमैटिक रिस्क भी बढ़ रहे हैं। अनुमान है कि अगले कुछ वर्षों में यह वर्कफोर्स 2.35 करोड़ के आंकड़े को पार कर जाएगा। यह सेक्टर लेबर को संभालने में तो मददगार साबित हो रहा है, लेकिन प्लेटफार्म-आधारित काम की अनिश्चितता अब एक बड़ा मुद्दा बन गई है। निवेशक अब कंपनियों के हाई-एफिशिएंसी मॉडल और बढ़ती सोशल और रेगुलेटरी कॉस्ट के बीच संतुलन को लेकर आशंकित हैं।

एल्गोरिदम का दबाव और सुरक्षा

संघर्ष की असली जड़ है 'एल्गोरिदम मैनेजमेंट'। कंपनियां डिजिटल सिस्टम के जरिए डिलीवरी टारगेट और कमाई तय करती हैं। इससे स्पीड और सुविधा तो बढ़ती है, लेकिन वर्कर्स पर अत्यधिक शारीरिक दबाव, बर्नआउट और सुरक्षा का खतरा मंडरा रहा है। NITI Aayog और लेबर सर्वे के डेटा के मुताबिक, वर्कर्स के पास पारंपरिक बीमा या पेड लीव जैसा कोई सेफ्टी नेट नहीं है। हालिया विरोध प्रदर्शनों ने भी कंपनियों के वर्किंग मॉडल और वर्कर्स की उम्मीदों के बीच की खाई को उजागर किया है।

रेगुलेटरी चुनौतियां

सरकारी स्तर पर अभी भी स्थिति साफ नहीं है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय लेबर ट्रीटीज पर संभलकर कदम उठाए हैं और 'डिसेंट वर्क इन द प्लेटफॉर्म इकोनॉमी' पर जून 2026 के कन्वेंशन से दूरी बनाए रखी है। सरकार का जोर अंतरराष्ट्रीय मानकों को भारत के घरेलू कानूनों के अनुकूल बनाने पर है। हालांकि e-Shram पोर्टल पर 31.89 करोड़ से अधिक इनफॉर्मल वर्कर्स का रजिस्ट्रेशन हो चुका है, लेकिन गिग वर्कर्स के लिए अभी तक कोई ठोस फेडरल फ्रेमवर्क नहीं है।

निवेशकों के लिए जोखिम

मौजूदा पॉलिसी वैक्यूम में अलग-अलग राज्यों के नियम कंपनियों के लिए मुश्किलें पैदा कर रहे हैं। यदि भविष्य में फेडरल स्तर पर कड़े नियम आते हैं—जैसे फिक्स्ड बेनिफिट्स या सोशल सिक्योरिटी योगदान—तो कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर सीधा असर पड़ेगा। लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी इस बात पर निर्भर करेगी कि कंपनियां अपने बिजनेस मॉडल को लेबर प्रैक्टिस के साथ कैसे ढालती हैं। फिलहाल, निवेशकों को Code on Social Security और Periodic Labour Force Survey पर नजर रखनी चाहिए, जो आने वाले समय में लेबर पॉलिसी की दिशा तय करेंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.