भारत ने अपने GDP कैलकुलेशन के लिए **2022-23** को नया बेस ईयर बनाया है। सरकार इसे सांख्यिकीय सटीकता में सुधार बता रही है, जबकि एक्सपर्ट्स इसके असर को लेकर सतर्क हैं। निवेशकों के लिए 'डबल डिफ्लेशन' (Double Deflation) जैसे तकनीकी बदलावों को समझना जरूरी है।
आंकड़ों में बड़ा बदलाव
Ministry of Statistics and Programme Implementation (MoSPI) ने हाल ही में Q1 FY 2026-27 के 7.8% GDP ग्रोथ रेट का बचाव किया है। फरवरी 2026 में भारत ने राष्ट्रीय खातों के कैलकुलेशन के लिए 2022-23 को नया आधार वर्ष (Base Year) बनाया है। इसका मकसद GST फाइलिंग और Producer Price Index जैसे आधुनिक डेटा का इस्तेमाल कर इकोनॉमी की सटीक तस्वीर पेश करना है।
क्या है 'डबल डिफ्लेशन' का पेंच?
इस नई सीरीज का सबसे अहम हिस्सा 'डबल डिफ्लेशन' (Double Deflation) मेथड है। यह इंडस्ट्री के वैल्यु एडिशन को नापने का एक तरीका है, जिसमें फाइनल आउटपुट की वैल्यू में से रॉ मटेरियल की लागत को घटाया जाता है। हालांकि यह ग्लोबल स्तर पर सटीक माना जाता है, लेकिन इसके नतीजे कभी-कभी हैरान करने वाले हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में Q1 के दौरान 1.5% का निगेटिव GVA डिफ्लेटर देखा गया, जो तब होता है जब कच्चे माल की कीमत फाइनल प्रोडक्ट से तेजी से बढ़ जाती है।
नीतिगत और निवेश पर असर
आर्थिक जानकारों का मानना है कि पुराने डेटा के साथ इन नए आंकड़ों का मिलान करना निवेशकों के लिए भ्रम पैदा कर सकता है। वहीं, इसका असर फिस्कल पॉलिसी पर भी पड़ेगा। संशोधित GSDP (Gross State Domestic Product) के आंकड़े ही Finance Commission तय करता है कि केंद्र सरकार राज्यों के साथ टैक्स का बंटवारा कैसे करेगी। अगर राज्यों की आय के अनुमानों में बदलाव आता है, तो राज्यों के लिए बजट संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं।
सरकार का कहना है कि ये बदलाव सामान्य सांख्यिकीय सुधार हैं, लेकिन निवेशकों को केवल हेडलाइन ग्रोथ नंबरों के बजाय गहराई में जाकर तकनीकी बदलावों पर नजर रखनी चाहिए।
