74% भारतीयों को मिला फॉर्मल क्रेडिट! बदले भारत के वित्तीय नक्शे के ये हैं संकेत

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
74% भारतीयों को मिला फॉर्मल क्रेडिट! बदले भारत के वित्तीय नक्शे के ये हैं संकेत

भारत में फॉर्मल क्रेडिट की पहुंच एक बड़ा मुकाम हासिल कर चुकी है। ट्रांसयूनियन सिबिल की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2026 तक देश की 74% क्रेडिट-योग्य आबादी, यानी करीब 89 करोड़ लोग, फॉर्मल रिटेल क्रेडिट का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह 2017 के 35% के आंकड़े से काफी बड़ी छलांग है।

वित्तीय समावेशन में क्रांति

यह रिपोर्ट देश में वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) की रफ्तार को दर्शाती है। क्रेडिट कार्ड्स और पर्सनल लोन जैसे कंजम्पशन-आधारित लेंडिंग (Consumption-led Lending) ने इस विस्तार में अहम भूमिका निभाई है। पिछले कुछ सालों में, जहां नए ग्राहक बनाने की रफ्तार धीमी हुई है, वहीं लेंडर्स (Lenders) अब पुराने ग्राहकों के साथ रिश्ते मजबूत करके ग्रोथ बनाए रखने पर जोर दे रहे हैं।

बाजार का बदलता स्वरूप

रिपोर्ट बताती है कि 2017 में जहां कुल रिटेल लोन में नए ग्राहकों (New-to-Credit) की हिस्सेदारी 32% थी, वह 2026 में घटकर 13% रह गई है। इसका मतलब है कि अब बैंक और एनबीएफसी (NBFCs) के लिए नए ग्राहक खोजना पहले जितना आसान नहीं रहा। अब ग्रोथ के लिए मौजूदा क्रेडिट-एक्टिव ग्राहकों पर फोकस करना होगा।

भौगोलिक बदलाव: यूपी और एमपी की बढ़ती अहमियत

क्रेडिट की मांग अब सिर्फ महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे पारंपरिक वित्तीय केंद्रों तक सीमित नहीं रही है। इसमें एक बड़ा बदलाव उत्तरी और मध्य भारत की ओर हुआ है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्य क्रेडिट की मांग के प्रमुख केंद्र बनकर उभर रहे हैं। यह दिखाता है कि वित्तीय सेवाएं छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों तक भी पहुंच रही हैं, जो इन क्षेत्रों में आर्थिक खपत (Economic Consumption) को बढ़ावा दे सकती हैं।

निवेशकों के लिए नए संकेत

हालांकि भारत में क्रेडिट की पहुंच अभी भी कई विकसित देशों से कम है, लेकिन मौजूदा परिदृश्य में निवेशकों के लिए कुछ जोखिम हैं जिन पर नजर रखनी होगी। नए कर्जदारों की संख्या कम होने से मौजूदा ग्राहकों के लिए बैंकों और एनबीएफसी के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। इससे नेट इंटरेस्ट मार्जिन (Net Interest Margins) पर दबाव आ सकता है, क्योंकि लेंडर्स रेट्स पर कंपीट कर सकते हैं या मार्केट शेयर हासिल करने के लिए लेंडिंग स्टैंडर्ड्स को थोड़ा ढीला कर सकते हैं।

इसके अलावा, मौजूदा सेगमेंट पर फोकस से कंसंट्रेशन रिस्क (Concentration Risk) बढ़ जाता है। हालांकि, कमर्शियल पोर्टफोलियो में 1.8% की डिफ्लिंसी (Delinquency) दर जैसी कुल डिफ्लिंसी का स्तर स्थिर बना हुआ है, निवेशकों को खास रिटेल सेगमेंट में संभावित तनाव पर नजर रखनी चाहिए। पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा आक्रामक लेंडिंग का कारण बन सकती है, जो अंततः एसेट क्वालिटी (Asset Quality) को प्रभावित कर सकती है, खासकर अगर वैश्विक कारक जैसे कच्चे तेल की ऊंची कीमतें घरेलू बजट पर दबाव डालना शुरू कर दें।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.