31 जुलाई 2026 तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) लगभग तीन महीने के उच्च स्तर **₹692.9 अरब** पर पहुँच गया है। सेंट्रल बैंक की फॉरेन करेंसी डिपॉजिट स्कीम से मिले भारी इनफ्लो के चलते यह वृद्धि हुई है, जिससे रुपये को ग्लोबल इकोनॉमिक उथल-पुथल के खिलाफ एक मजबूत सहारा मिला है।
फॉरेक्स रिजर्व में आई ज़बरदस्त उछाल
31 जुलाई 2026 तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) बढ़कर ₹692.9 अरब डॉलर हो गया है। यह पिछले छह महीनों में साप्ताहिक आधार पर सबसे बड़ी वृद्धि है, जिसमें सिर्फ एक हफ्ते में सेंट्रल बैंक के भंडार में लगभग $10.5 अरब का इजाफा हुआ है। भंडार में यह बढ़ोतरी देश की बाहरी वित्तीय स्थिरता को प्रबंधित करने की क्षमता का एक महत्वपूर्ण पैमाना है।
RBI की स्कीम का कमाल
इस तेज उछाल का मुख्य कारण रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा जून में शुरू की गई विशेष फॉरेन-करेंसी डिपॉजिट ड्राइव है। इस फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (FCNR) डिपॉजिट स्कीम के जरिए बैंकों ने सफलतापूर्वक लगभग $36.7 अरब जुटाए हैं। इस पहल का उद्देश्य विदेशी पूंजी को आकर्षित करना और भुगतान संतुलन (Balance of Payments) को बेहतर बनाना था। बैंकों को प्रोत्साहन देने के लिए, RBI ने जीरो-कॉस्ट हेजिंग सुविधा भी शुरू की थी, जो 30 सितंबर 2026 तक जारी रहेगी।
निवेशकों और अर्थव्यवस्था के लिए सुरक्षा कवच
यह बढ़ा हुआ भंडार निवेशकों और व्यापक अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच का काम करता है। अब 10 महीने से अधिक के इंपोर्ट कवर और लगभग 90.8% के एक्सटर्नल डेट कवर के साथ, सेंट्रल बैंक वैश्विक घटनाओं से उत्पन्न होने वाले झटकों से निपटने के लिए बेहतर स्थिति में है। इसमें लगातार बदलते तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक तनावों का असर भी शामिल है, जिन्होंने हाल ही में भारतीय रुपये पर दबाव बनाया है।
रुपया और ब्याज दर पर RBI का रुख
भंडार की स्थिति मजबूत होने के बावजूद, रुपया अभी भी एक चुनौतीपूर्ण वैश्विक माहौल में कारोबार कर रहा है। 5 अगस्त 2026 तक, रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 95.07 पर कारोबार कर रहा था। यह प्रदर्शन RBI की हालिया मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) के रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखने के फैसले के साथ आया है। ब्याज दरों को स्थिर रखने के सेंट्रल बैंक के फैसले से यह संकेत मिलता है कि वे आर्थिक विकास के साथ-साथ महंगाई पर नियंत्रण को संतुलित करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, भले ही ग्लोबल मार्केट बाहरी संकेतों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है।
आगे की राह
भविष्य में, निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि सितंबर में जीरो-कॉस्ट हेजिंग सुविधा समाप्त होने के बाद इन इनफ्लो की निरंतरता बनी रहती है या नहीं। निवेशक इस बात पर भी नजर रखेंगे कि सेंट्रल बैंक वैश्विक अनिश्चितता और अंतरराष्ट्रीय लिक्विडिटी की स्थितियों में संभावित बदलावों के बीच करेंसी की अस्थिरता को प्रबंधित करने के लिए इस बढ़े हुए भंडार का उपयोग कैसे करता है।
