भारत की कंपेंसेटरी एफ़ॉरेस्टेशन पॉलिसी पर सवाल उठ रहे हैं। इसका सीधा असर इंफ्रास्ट्रक्चर और माइनिंग सेक्टर की कंपनियों पर पड़ सकता है, क्योंकि सख्त पर्यावरण नियमों के चलते प्रोजेक्ट्स में देरी और लागत बढ़ने का खतरा है।
भारत का वर्तमान 'कंपेंसेटरी एफ़ॉरेस्टेशन' मॉडल अब जांच के दायरे में है। मौजूदा नियमों के तहत, डेवलपर्स को जंगल की जमीन इस्तेमाल करने की इजाजत तब मिलती है, जब वे कहीं और उतनी ही संख्या में पेड़ लगाने का फंड जमा करते हैं। लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पेड़ लगा देना पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) की भरपाई नहीं करता, जिससे जैव विविधता को भारी नुकसान हो रहा है।
निवेशकों के लिए क्यों है यह चिंताजनक?
इंफ्रास्ट्रक्चर, माइनिंग और रियल एस्टेट से जुड़ी कंपनियां, जिन्हें फॉरेस्ट क्लीयरेंस की जरूरत होती है, अब सीधे तौर पर ESG (Environmental, Social, and Governance) जोखिमों के घेरे में हैं। अगर सरकार आने वाले समय में विज्ञान-आधारित और सख्त नियम लागू करती है, तो प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिलने में लंबा समय लग सकता है। साथ ही, अनुपालन (Compliance) के लिए कंपनियों को अपना खर्च भी बढ़ाना पड़ सकता है।
CAMPA फंड और BRSR का असर
फिलहाल, CAMPA (Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority) के तहत फंड के इस्तेमाल पर भी सवाल हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, लगाए गए पौधों के जीवित रहने की दर काफी कम है। वहीं, BRSR (Business Responsibility and Sustainability Reporting) के तहत बढ़ती पारदर्शिता की जरूरतों के बीच, निवेशक अब कंपनियों द्वारा किए गए पर्यावरण सुधारों और उनके लॉन्ग-टर्म इम्पैक्ट पर बारीकी से नजर रख रहे हैं।
आने वाले समय में, पर्यावरण मंत्रालय की नीतियों में बदलाव संभव है, जहां सरकार केवल पेड़ लगाने के बजाय विशिष्ट देशी आवासों को बहाल करने पर जोर दे सकती है। यह बदलाव पारिस्थितिकी के लिए तो अच्छा होगा, लेकिन कंपनियों के लिए ऑपरेशनल कॉस्ट में 10% से 20% तक का इजाफा कर सकता है और काम शुरू होने में देरी भी पैदा कर सकता है।
