World Bank के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा का मानना है कि भारत की अनुशासित राजकोषीय नीति वैश्विक वित्तीय अस्थिरता से बचाव तो कर रही है, लेकिन ऊंची ऊर्जा लागत और विदेशी पूंजी पर निर्भरता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। निवेशकों के लिए इन बाहरी कारकों पर नजर रखना जरूरी है।
भारत की आर्थिक नींव कई विकसित देशों की तुलना में काफी स्थिर है, लेकिन वर्ल्ड बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा के मुताबिक, देश वैश्विक वित्तीय चुनौतियों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। बढ़ती ऊर्जा कीमतों और अंतरराष्ट्रीय बॉन्ड यील्ड के कारण वैश्विक स्तर पर मांग में कमी देखी जा रही है, ऐसे में भारत के लिए अपनी राजकोषीय अनुशासन (Fiscal Discipline) और विदेशी फाइनेंसिंग पर निर्भरता के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है।
ऊर्जा आयात का बड़ा दबाव
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एनर्जी इम्पोर्ट सबसे संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। देश अपनी घरेलू तेल खपत का लगभग 90% हिस्सा विदेश से आयात करता है, जिससे कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव सीधे हमारे आयात बिल (Import Bill) पर चोट करता है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उधार लेना भी महंगा हो गया है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में ब्याज दरें ऊंची रहने के कारण ग्लोबल कैपिटल कॉस्ट बढ़ गई है, जिससे क्रेडिट मार्केट पर दबाव पड़ता है और विदेशी फंड की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
राजकोषीय अनुशासन बना ढाल
इन बाहरी दबावों के बावजूद भारत का फिस्कल मैनेजमेंट एक सुरक्षा कवच प्रदान करता है। केंद्र सरकार ने फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के लिए फिस्कल डेफिसिट का लक्ष्य 4.3% जीडीपी रखा है। यह अनुशासित खर्च कई विकसित देशों की तुलना में बेहतर है, जो इस वक्त ऊंचे कर्ज-जीडीपी अनुपात से जूझ रहे हैं। यह वित्तीय सेहत नीति निर्माताओं को अमेरिका के फेडरल रिजर्व के ब्याज दर चक्र का पीछा करने के बजाय घरेलू जरूरतों के हिसाब से अर्थव्यवस्था को प्रबंधित करने की आजादी देती है।
विदेशी पूंजी पर निर्भरता
भारत की विकास रणनीति अभी भी उन निवेशों के लिए विदेशी पूंजी पर टिकी है जो घरेलू बचत से अधिक हैं। हालांकि फाइनेंशियल ईयर 2026-27 की पहली तिमाही में करंट अकाउंट डेफिसिट $4.2 बिलियन (लगभग 0.5% जीडीपी) पर कंट्रोल में रहा है, लेकिन इसे बनाए रखने के लिए लगातार विदेशी पूंजी प्रवाह (Capital Inflow) जरूरी है। यदि वैश्विक लिक्विडिटी और सख्त होती है या अंतरराष्ट्रीय बाजार में उधार लेना और महंगा होता है, तो निवेश की मौजूदा रफ्तार बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
निवेशकों को अब ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतों के रुझान और विदेशी पूंजी प्रवाह की स्थिरता पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है। भारत की राजकोषीय स्थिति मजबूत है, लेकिन बाहरी फंडिंग पर निर्भरता का मतलब है कि घरेलू बाजार को वैश्विक वित्तीय हालात पर लगातार नजर रखनी होगी।
