चालू फाइनेंशियल ईयर के पहले **5** महीनों में भारत का फिस्कल डेफिसिट (राजकोषीय घाटा) **₹7.1 ट्रिलियन** यानी सालाना बजट लक्ष्य का **41.9%** पहुंच गया है। सरकार का कैपिटल एक्सपेंडिचर **18%** बढ़ा है, लेकिन टैक्स कलेक्शन के मोर्चे पर मिली-जुली तस्वीर दिख रही है।
इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश
सरकार इस बार लॉन्ग-टर्म एसेट्स बनाने पर पूरा फोकस कर रही है। अप्रैल से अगस्त के बीच कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) में 18% का इजाफा हुआ है और यह ₹5.1 ट्रिलियन के स्तर पर पहुंच गया है। डिफेंस और रेलवे जैसे सेक्टर्स में हो रहे इस निवेश से आर्थिक गतिविधियों को रफ्तार मिलने की उम्मीद है। पांच महीने की अवधि में कुल सरकारी खर्च ₹20.78 ट्रिलियन रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 10.1% ज्यादा है।
टैक्स कलेक्शन की चुनौती और जोखिम
राजस्व के मोर्चे पर स्थिति थोड़ी जटिल है। डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन तो मजबूती दिखा रहा है, लेकिन एक्साइज और कस्टम ड्यूटी जैसे इनडायरेक्ट टैक्स दबाव में हैं। सरकार का लक्ष्य है कि पूरे साल का फिस्कल डेफिसिट जीडीपी (GDP) का 4.3% रहे, जो पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या डायरेक्ट टैक्स की ग्रोथ इनडायरेक्ट टैक्स की कमी को पूरा कर पाएगी।
ग्लोबल मार्केट और अनिश्चितता
निवेशकों की नजरें अब कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों और इंटरनेशनल बॉन्ड यील्ड्स पर हैं। ग्लोबल स्तर पर उतार-चढ़ाव भारतीय बैलेंस शीट पर असर डाल सकते हैं। यदि तेल की कीमतें या बॉन्ड यील्ड्स बढ़ती हैं, तो सरकार के लिए उधार लेने की प्रक्रिया और महंगी हो सकती है। अब बाजार इस बात पर नजर रखेगा कि क्या साल की दूसरी छमाही में टैक्स वसूली की रफ्तार बनी रहती है ताकि सब्सिडियों के बोझ को संभाला जा सके।
