India’s Financial Paradox: संपत्ति बढ़ी लेकिन आर्थिक मजबूती गायब, क्या खतरे में है आम परिवार?

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AuthorMehul Desai|Published at:
India’s Financial Paradox: संपत्ति बढ़ी लेकिन आर्थिक मजबूती गायब, क्या खतरे में है आम परिवार?

बिजली और स्वच्छता जैसी सुविधाओं में भारत ने बड़ी तरक्की की है, लेकिन चौंकाने वाला सच यह है कि हर चौथा भारतीय परिवार आर्थिक संकट से निपटने के लिए तैयार नहीं है। आय में **5 गुना** उछाल के बावजूद असली 'फाइनेंशियल रेजिलीएंस' (Financial Resilience) का अभाव एक नई चिंता बन गया है।

पिछले दो दशकों में भारत की जीवनशैली में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। साल 2004 में जहां बिजली की पहुंच 75% घरों तक थी, वह आज बढ़कर 99% के करीब पहुंच गई है। वहीं, स्वच्छता कवरेज भी 53% से उछलकर 95% हो गया है। इसके साथ ही, औसत सालाना घरेलू आय 5 गुना बढ़कर लगभग ₹3.36 लाख तक पहुंच गई है, जिससे स्मार्टफोन और फ्रिज जैसे सामानों की ओनरशिप में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है।\n\nहालांकि, यह भौतिक विकास एक गहरे आर्थिक विरोधाभास को भी जन्म दे रहा है। डेटा के मुताबिक, देश के लगभग 25% परिवार बेसिक फाइनेंशियल सिक्योरिटी टेस्ट में फेल हो रहे हैं। इन परिवारों के पास इतने बचत या अतिरिक्त फंड नहीं हैं कि वे किसी छोटे से आर्थिक झटके को झेल सकें। इनकी सुख-सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन सर्वाइवल अभी भी नाजुक स्थिति में है।\n\n2020-21 की महामारी ने इस नई आर्थिक हकीकत की पोल खोल दी। संकट के समय घरेलू उपकरण किसी काम नहीं आए। पीक के दौरान, केवल 48.2% परिवार ही ऐसे थे जिनके पास पॉजिटिव सेविंग्स और इनकम हेडरूम था। इसका मतलब है कि एक बड़ी आबादी की कमाई सिर्फ बेसिक खर्चों में ही खत्म हो जाती है, जिससे इमरजेंसी के लिए कुछ नहीं बचता।\n\nअब नीति निर्माताओं के सामने चुनौती यह है कि गरीबी मापने के पुराने तरीके, जो केवल बुनियादी सुविधाओं पर आधारित थे, अब नाकाफी साबित हो रहे हैं। आर्थिक सुरक्षा का असली पैमाना अब यह नहीं है कि घर में क्या है, बल्कि यह है कि परिवार किसी आर्थिक तनाव को कितनी मजबूती से झेल सकता है। आने वाले समय में, पूरी बहस अब केवल इंफ्रास्ट्रक्चर से हटकर 'फाइनेंशियल रेजिलीएंस' को मजबूत करने पर केंद्रित होगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.