साल 2026 के फेस्टिव सीजन के लिए भारतीय ई-कॉमर्स सेक्टर पूरी तरह तैयार है। डेटा के मुताबिक, गिग वर्कर्स की मांग में **20%** का उछाल आने की उम्मीद है, जिसमें अकेले क्विक-कॉमर्स का योगदान **45%** रहने वाला है। हालांकि, बढ़ती मजदूरी और रिक्रूटमेंट इंसेंटिव का कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर क्या असर पड़ेगा, इस पर निवेशकों की नजरें टिकी हैं।
भारत में फेस्टिव सीजन के दौरान रिटेल और लॉजिस्टिक्स सेक्टर में नौकरियों की मांग में जबरदस्त तेजी देखी जा रही है। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स का ऑर्डर वॉल्यूम साल-दर-साल 25% बढ़ने का अनुमान है, जिसे पूरा करने के लिए कंपनियां आक्रामक रूप से अस्थायी और गिग रोल पर भर्तियां कर रही हैं।
क्विक-कॉमर्स का दबदबा
इस सीजन की सबसे बड़ी खासियत क्विक-कॉमर्स का बढ़ता वर्चस्व है। कुल फ्लेक्सिबल वर्कफोर्स का 45% हिस्सा इसी सेक्टर से आ रहा है, जिसका मतलब है कि करीब 1.25 लाख अस्थायी पद भरे जाएंगे। पारंपरिक ई-कॉमर्स मॉडल में जहां हायरिंग 16-18% बढ़ रही है, वहीं क्विक-कॉमर्स में यह उछाल 110-120% तक पहुंच गया है।
टियर-2 और टियर-3 शहरों में विस्तार
यह हायरिंग अब सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। कुल वर्कफोर्स डिमांड का करीब 45% हिस्सा लखनऊ, भुवनेश्वर, जयपुर और कोयंबटूर जैसे शहरों से आ रहा है। Blinkit, Swiggy Instamart, Zepto और Tata BigBasket जैसे प्लेटफॉर्म अब छोटे शहरों में अपनी पहुंच बढ़ा रहे हैं, जहां ग्रोसरी और होम फर्निशिंग जैसे सामानों की मांग तेजी से बढ़ रही है।
मार्जिन पर बढ़ता दबाव
तेजी के साथ-साथ कंपनियों के सामने चुनौतियां भी हैं। डिलीवरी और वेयरहाउस स्टाफ के लिए मची होड़ के बीच कंपनियों को पिछले साल के मुकाबले 10-15% ज्यादा वेतन देना पड़ रहा है। इसमें वेरिएबल पे, अटेंडेंस बोनस और सर्ज मल्टीप्लायर्स शामिल हैं। TeamLease Services के अनुसार, यह बढ़ती लागत सीधे कंपनियों के EBITDA मार्जिन पर दबाव डाल सकती है।
आगे का रास्ता
कंपनियां इस भर्ती अभियान का उपयोग परमानेंट रोल की पाइपलाइन बनाने के लिए भी कर रही हैं, जहां करीब 25% सीजनल स्टाफ के भविष्य में स्थायी होने की संभावना है। निवेशकों के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या बढ़ता हुआ भौगोलिक विस्तार और रेवेन्यू, लेबर और लास्ट-माइल लॉजिस्टिक्स की बढ़ती लागत को कवर कर पाएगा।
